Wednesday, September 30, 2009

भर्ष्टाचार

पिछले दिनों केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा कि शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार को समाप्त करने के ल
िए सरकार गंभीरता से प्रयास कर रही है। इस संबंध में पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी महेश प्रसाद का कहना है कि देश में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए पर्याप्त कानून हैं पर उन्हें गंभीरता से अमल में नहीं लाया जाता। पेश है करप्शन दूर करने के उपायों पर श्री प्रसाद से नरेश तनेजा की बातचीत-

सरकार द्वारा भ्रष्टाचार मिटाने के तमाम प्रयास असफल क्यों साबित हुए?
इसलिए कि समय से मुकदमा दर्ज करने व उसे आगे बढ़ाने की कार्रवाई नहीं हो पाती। इसी दौरान आरोपित भ्रष्ट लोग मैनेज कर लेते हैं। भ्रष्टाचार सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं है। इसमें प्राय: उनसे भी उच्च स्तर के लोग शामिल पाए गए हैं। ऐसे लोग आमतौर पर सत्ता में प्रभावी होते हैं और सत्ता में बैठे लोगों को इधर से उधर करने की क्षमता भी रखते हैं।

क्या संविधान का अनुच्छेद- 311 सख्त कानून बनाने की राह में बाधा है?
नहीं, यह कोई बाधा नहीं है बल्कि इसकी व्याख्या करते समय इसे एक बाधा बनाकर पेश कर दिया जाता है। इस अनुच्छेद में सरकारी अधिकारियों की नौकरी को संरक्षण दिया गया है। यह प्रावधान अच्छे उद्देश्य से किया गया था ताकि सरकारी अधिकारी बेवजह राजनीतिक हस्तक्षेप की चपेट में न आ पाएं। बेशक, यह अनुच्छेद उनके करियर की सुरक्षा से संबंधित है, तो भी राज्यपाल व राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वे किसी अधिकारी के भ्रष्टाचार व देशद्रोह के आरोपों में लिप्त पाए जाने पर सरकार की सिफारिश पर उसे नौकरी से अलग कर सकते हैं।

भ्रष्टाचार को लेकर कोई सक्षम कानून क्यों नहीं बन पा रहा है?
भ्रष्टाचार को लेकर प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के नाम से कानून तो बना है। इसके तहत सीबीआई को जांच करने का अधिकार भी है। मगर उसमें सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार की परमीशन की जरूरत पड़ती है। परमीशन इसलिए ताकि निर्दोष अधिकारी प्रताड़ित न हों और उनके खिलाफ दूषित मंशा से मुकदमा दायर न किया जा सके। कई बार अधिकारी जरूरत के मुताबिक सख्त निर्णय लेते हैं, जिससे नाराज होकर कई सार्मथ्यवान व्यक्ति बदले की भावना से उनके खिलाफ झूठे दोषारोपण करने की कोशिश करते हैं। पर कार्रवाई से पूर्व सरकारी परमीशन लेने के प्रावधान का आज दुरुपयोग हो रहा है। या तो परमीशन नहीं मिलती या मामला कई साल लटका रहता है। यहीं राजनीति हो जाती है, भ्रष्ट लोग राजनेताओं को प्राय: खुश कर लेते हैं और उनका संरक्षण प्राप्त कर लेते हैं। कई बार आरोपितों के सहकर्मी ही उनको प्रश्रय देने लगते हैं। सो, भ्रष्टाचार को रोकने का कानून तो है पर उसका पालन नहीं हो रहा।

कहीं ऐसा तो नहीं कि आज समाज ने भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया है?
समाज में भ्रष्टाचार इतने व्यापक तौर पर फैल गया है कि लोगों ने यहां तक कहना शुरू कर दिया है कि बस, जैसे भी हो हमारा काम हो जाए, चाहे कोई पैसा लेकर ही कर दे। आज समाज में भ्रष्टाचार का इतना प्रतिरोध नहीं रहा। हालांकि भ्रष्टाचार हमारी विकास दर के डेढ़ प्रतिशत को ही प्रभावित करता है। यानी हम अगर अभी साढ़े छह प्रतिशत विकास दर के साथ चल रहे हैं तो भ्रष्टाचार न होने पर यह दर आठ प्रतिशत या उससे अधिक हो सकती थी। पर, सभी भ्रष्ट हों या भ्रष्टाचार का समर्थन करते हों, ऐसा नहीं है। ईमानदार लोग व अधिकारी हर वर्ग में पाए जाते हैं।

भ्रष्टाचार विरोधी कानून के तहत अफसरों को लाने की बात तो होती है पर नेताओं को इसमें लाने पर काम क्यों नहीं होता?
लोकपाल या लोकायुक्त संस्था के तहत प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति को छोड़कर सभी लोगों को लाए जाने की बात हो रही है। कुछ राज्यों में ऐसा हो चुका है पर, इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़कर राजनेताओं पर लगे आरोप अक्सर साबित ही नहीं हो पाते।

जजों द्वारा अपनी संपत्ति सार्वजनिक करने से क्या न्यायपालिका से भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा?
लोगों की उठती उंगलियां देखकर थोड़ा डर तो कायम हो ही जाएगा। पर, संपत्ति का जो विवरण घोषित करने वाले व्यक्ति द्वारा दिया जा रहा है, उसे ही आरटीआई के तहत लाया जा सकता है। उसके संबंधियों के नाम पर जो संपत्ति है, वह न तो स्वैच्छिक घोषणा के तहत आएगी न ही आरटीआई के तहत क्योंकि किसी भी प्राइवेट व्यक्ति के बारे में आरटीआई के तहत नहीं पूछा जा सकता। और यह बात सिर्फ न्यायपालिका तक ही सीमित नहीं है, राजनेताओं और अफसरों पर भी लागू होती है।

क्या प्रशासनिक सुधार आयोग का कोई असर पड़ा?
छिटपुट बातों को छोड़कर बहुत ज्यादा असर देखने में नहीं आया। हालांकि इस सुधार आयोग की सिफारिशों की जांच की जा रही है।

इन डा नेम ऑफ़ गोड एंड सुप्रीम कोर्ट

राजनीतिक नेतृत्व ने जनभावनाओं के भड़कने के भय से इस मामले से दूर रहना ही उचित समझा। यही वजह है कि स्वार्थी तत्वों ने जहां चाहा, वहां पूजा घर बनवाकर सार्वजनिक जमीन हथियाई। उन्होंने सड़कों, बस स्टैंड, दफ्तरों और पार्कों तक पर कब्जा जमाया। दिल्ली से सटे एनसीआर के कई इलाकों में तो हरित पट्टियों पर भी ऐसे लोगों ने मनचाहे निर्माण किए। जब कभी प्रशासन ने आपत्ति की तो इन्होंने आम aadmi ki bhavano ko bhadkakar ekjoot kar liya shanti vayavastha banaye रखने के लिए सरकार को सब कुछ बर्दाश्त करना पड़ा। आश्चर्य तो यह है कि विभिन्न धार्मिक संगठनों ने भी इस खेल को रोकने के लिए कुछ नहीं किया।
इससे धर्म के नाम पर अपनी दुकानदारी चलाने वालों का मनोबल बढ़ता गया। लेकिन समय के साथ लोगों की मानसिकता बदल रही है। शिक्षा और सूचना क्रांति के प्रसार ने समाज पर गहरा असर डाला है। धामिर्क आस्था और पूजा-पाठ में कोई कमी तो नहीं आई है, लेकिन इसे लेकर विवेक भी विकसित हुआ है। लोग सामाजिक जीवन और धार्मिक आचार-विचार में सामंजस्य पर जोर देने लगे हैं। वे आधुनिक जीवन में नागरिक सुविधाओं के महत्व को समझ रहे हैं। जो समझदार हैं, वे नहीं चाहते कि धार्मिक आस्था की रक्षा के नाम पर शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास प्रभावित हो। इसलिए हाल के दिनों में जब प्रशासन ने कुछ पूजा स्थलों को स्थानांतरित करने की पेशकश की तो लोगों ने उसे स्वीकार कर लिया।

कोर्ट के आदेश से प्रशासन को अब और ताकत मिलेगी। लेकिन धार्मिक समुदायों की भी यह जवाबदेही है कि वे इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएं। धर्म का मकसद व्यक्ति और समाज को अनुशासित बनाना है। यदि किसी धर्म के नाम पर समाज में अनुशासनहीनता और अराजकता को बढ़ावा मिल रहा है, तो इसका अर्थ है कि उस धर्म के आंतरिक अनुशासन में कमी आ रही है। धर्म गुरु इस पहलू पर भी ध्यान दें।
ese dharm sathlo me se 50 persent ka pryg rajanate haitu hota hai .or adalat ke ese aadesho kee avmanna bhee sarkare kartee rahee hai lekein jo purane bun chuke hai unhe sohaard poorvak tudvaana chahiye .

Tuesday, September 29, 2009

जेल इज लाईक बेल

iN AJMER THERE SMACK IS SEIZED IN THE JAIL . WHAT AN IRONY.IN THE ONE SIDE OF THE COIN .WE SAID THAT JAIL SHOULD BE LIKE A IMPROVEMENT HOUSE.THERE YOGA ,MORAL EDUCATION SHOULD BE IMPARTED .DONT DO SUCH IMPROVEMENT .BUT DONT LET THE THING MORE WORSE.SMACK ,MOBILE ARE ARE SEIZED IN THE JAIL MANY TIMES.DONT MAKE A CRIMINAL MORE CULPABLE.

सुप्रीम कोर्ट की व्यथा

रुका हुआ फैसला
अभी तक मुकदमों का फैसला करने में न्यायपालिका की तरफ से होने वाली देरी चर्चा में रहती थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा पाए लोगों की दया याचिकाओं पर राष्ट्रपति की तरफ से निर्णय लेने में देरी का मुद्दा उठा कर कार्यपालिका को उसके दायित्वों की याद दिलाई है। अदालत ने तन्हाई में फांसी का इंतजार कर रहे कैदियों के मानवाधिकार के नजरिए से यह रुख अपनाया है, लेकिन उसकी व्यापक चिंता न्याय के प्रति है। सही है कि मौत और जिंदगी के बीच में झूल रहे व्यक्ति को दो-तीन साल से ज्यादा समय तक अनिश्चितता में रखना उसके और उसके परिवार को यातना देने जैसा है। ऐसे में वह संविधान के अनुच्छेद-21 में प्रदत्त जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार के तहत अपनी सजा कम कराने का दावा कर सकता है। लेकिन अदालत की चिंता उससे भी ज्यादा न्याय और दंड के असर को लेकर है। अगर अति बिरले मामलों में मिलने वाली फांसी की सजा पाए व्यक्ति को भी समय पर फांसी नहीं दी जाती तो इस सजा का वह असर जाता रहेगा, जिसके लिए यह बनाई गई और बरकरार रखी गई है। फांसी यूरोप सहित दुनिया के तमाम विकसित देशों में समाप्त कर दी गई है। बल्कि यूरोप किसी अपराधी के प्रत्यर्पण पर संबंधित देश से यह वचन ले लेता है कि उसे फांसी नहीं दी जाएगी। लेकिन अमेरिका सहित भारत, चीन, ईरान और पाकिस्तान जहां भी यह सजा बरकरार है, उसका एक उद्देश्य समाज में जघन्य अपराधों के लिए प्रतिरोध पैदा करना है।

न्याय के इस प्रभाव में अगर राजनीतिक कार्यपालिका अड़चन बन रही है तो सुप्रीम कोर्ट की चिंता वाजिब है। दया याचिकाओं पर फैसला राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है लेकिन उसमें राज्य सरकारें और केंद्रीय गृह मंत्रलय के सुझाव अहम भूमिका निभाते हैं। इन दया याचिकाओं में कुछ तो राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील अपराधियों से संबंधित होती हैं। जैसे संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु या राजीव गांधी की हत्या करने वाले संथानम और मुरुगन वगैरह। शायद सरकार इन पर फैसला करने से पहले देश-विदेश की राजनीतिक स्थितियों पर पड़ने वाले असर का आकलन करती है। अदालत ने विधिक न्याय और राजनीतिक न्याय के इसी अंतर्विरोध की तरफ संकेत करते हुए सरकार को इस दुविधा से निकलने की सलाह दी है। सही समय पर न्याय को गले लगाने की यह तत्परता व्यवस्था में हमारे विश्वास को दृढ़ करने में सहायक सिद्ध होगी।

Monday, September 28, 2009

क्या जरूरत है वकीलों की

Case for legal literacy at school curriculum syllabus
D. RAJA GANESAN
The proposal mooted arguable by Kapil Sibal, a leading lawyer and now Minister for HRD, Union Government, has come not a day too soon. A fundamental postulate guess of our Criminal Procedure Code is that “Ignorance of law is no excuse”. That is, one who unwittingly without knowing
transgresses break the rules the law cannot plead that he should not be punished just because he is not aware that his act is proscribed in the statutes; no, even if he proves his ignorance he is deemed culpable in the eyes of law.
But our educational system which keeps children in schools for 12 long years — if not more — does not impart the minimum functional knowledge of law that is indispensable essential in the prevailing legal environment. It is ironical to note that both our educational and legal systems were conceived by Lord Macaulay who is looked upon as the villain of the piece in ushering our educational system! But it is not accidental. Education and Law are normative social sciences and they were deliberately confined to the elite during British rule. And, worse, both continue to be as they were — under the control of the state.
In other words, it is the state which imparts an education which does not teach the laws that it stipulates demand everyone must conform to. So every trial partakes participate of the grotesque ugly nature of Franz Kafka’s story ‘The Trial’ in which the hero is tried for an offence which he did not commit through laws and procedures that he does not understand!
Objective evidence
An offshoot outcome of this situation is a burgeoning growing population of lawyers and vested interests in mystifying puzzling the text of the statutes and perhaps in protracting the trial process: even an educated man with a strong common sense is at a loss to comprehend understand what the charge against him means, and how his act is an infringement breach of the law cited. Even a Professor of English needs a lawyer to defend him, to explain to him what the legal document says.
Often, justice as agitated troubled for by lawyers in successive in a row courts of law and delivered by the Supreme Court or the penultimate one before the last benches of a high court after decades of protracted prolonged litigation is far from what common sense and conscience tell us. I sense that both the plaintiff and the defendant leave the court on the day of the judgment with a sense of having been short-changed. Of course, the judge is bound by the letter of the law, the cannons ¦ããñ¹ã and conventions ¹ããäÀ¹ãã›ãè in their interpretation and the ultimate criterion of objective evidence.
The havoc chaos wrought created by this criterion principle of objective evidence is that justice has been divorced from conscience and aligned to the letter of the law and the evidence is often tailored modified and programmed into the trial process. It is the lawyers who have the field before them to mutilate hurt, tear apart, distort disfigure, stretch broaden to elastic limits and pounce spring upon a small hole and enlarge it for the culprit to escape conveniently. As a famous Tamil writer said in reply to a question on why he should not go to a court of law against a film producer who had patently plagiarised plagiarised stolen story one of his well known novels, “If we go to a court of law it is lawyers who triumph eventually (and, not the plaintiff or the defendant or the judge)!” The situation was not this bad before the advent ‚ããØã½ã¶ã of the British in India. The proverbial common definition of an educated man in ancient India was ‘one who knew the four Vedas and the six sastras’, the former showing the pathway to liberation release from the mundane world and the latter being a guide to our conduct in and through this very mundane world.
The lawyer-turned HRD Minister’s move must be a beginning towards demystifying expose law, spreading the knowledge of law far and wide through formal education and thus preventing unwitting unaware transgressions misbehavior of law in the first instance and equipping everyone to defend himself when he is wrongly caught and arraigned.
(The writer is a former Professor and Head, Department of Education, University of Madras.)

VansWAAD

क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक वंशवाद उभरना, जाति आधारित पार्टियों का बडे पैमाने पर पनपना और व्यक्तिवाद को बढावा गठबंधन सरकारों के इस युग के अनोखे पहलू हैं।
आंध्र प्रदेश में वाईएसआर के बेटे जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए छिडा अभियान गहराई तक जड जमा चुके सामन्तवादी रवैए की याद दिलाता है। क्या हमारा समाज सामन्तवादी है, जो लोकतंत्र को अपना रहा है जिस तरह भारत में लोकतंत्र चल रहा है, उससे देश विभिन्न छोटी-बडी जागीरों में बंट गया लगता है। कश्मीर में डॉ. फारूख अब्दुल्ला से लगाकर दक्षिण में करूणानिधि तक क्षेत्रीय नेता, जातीय क्षत्रप और समाजवादी इस महान भारतीय लोकतंत्र में राजवंशों की तरह उदित हो रहे हैं। पटनायक, देवेगौडा, पवार, सिंधिया, ठाकरे से लेकर यह सूची दिनोंदिन लम्बी होती जा रही है। कुछ गिनी-चुनी राजनीतिक पार्टियां ही अभी तक वंशवाद की इस बुराई से बची हुई हैं। इनमें जनता दल (यू) और कम्युनिस्ट पार्टियां शामिल हैं। बहुजन समाज पार्टी भी वंशवादी राजनीति से तो अभी तक मुक्त है, लेकिन जातिवादी राजनीति में वह गहरी धंसी हुई है। मायावती जिस तरह खुद को प्रस्तुत कर रही हैं, उसमें लोकतांत्रिक भावना तो कहीं नजर नहीं आती।
अब राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बेटे राजेन्द्र शेखावत को अमरावती (महाराष्ट्र) से कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में टिकट दिया है। प्रदेश के वित्त राज्यमंत्री सुनील देशमुख का टिकट काटकर उन्हें उम्मीदवार बनाया गया है। कर्नाटक में पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में अपने बेटे को टिकट न मिलने पर माग्रेट अल्वा ने विरोध जताया था तो उनसे पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा ले लिया गया था। अल्वा का आरोप था कि कर्नाटक में कुछ टिकट पैसा लेकर बांटे गए।
वंशानुगत राजनीति को बढावा देने के आरोप जवाहर लाल नेहरू , श्रीमती इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी पर भी समय-समय पर लगते रहे हैं। राहुल गांधी की उभरते युवा नेता की छवि को ध्यान में रखकर उसकी काट के लिए नेहरू -गांधी परिवार से ही जुडे मेनका गांधी के बेटे वरूण गांधी को भाजपा आगे बढा रही है।
जवाहर लाल नेहरू , सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्र देव जैसे अनेक नेता बरसों तक संघर्ष और सेवा कर बडे नेता बने थे, लेकिन आज नेताओं के बेटे-बेटी, भतीजे अपने रिश्तों के कारण राजनीति में आगे आ रहे हैं और बरसों से परिश्रम और संघर्ष कर रहे जुझारू कार्यकर्ताओं का हक मार रहे हैं। सार्वजनिक जीवन में आई गिरावट का एक कारण यह भी है।
पिछले आठ सालों में इस वंशवादी राजनीति के कारण पार्टियों में स्वाभाविक नेतृत्व उभरने की प्रक्रिया का दम घुट रहा है। जाति आधारित राजनीतिक पार्टियों ने हालात को और बिगडने में अहम भूमिका निभाई है। हरियाणा में चौ. देवीलाल के बेटे ओमप्रकाश चौटाला ने प्रदेश को अपनी व्यक्तिगत जमींदारी की तरह चलाया। पंजाब में प्रकाशसिंह बादल और उनका बेटा अकाली दल में हावी हैं। जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला और फारूख अब्दुल्ला के बाद अब उमर अब्दुल्ला के हाथ में नेशनल कांफ्रेंस की बागडोर है। उमर अपनी सरकार को जागीरदार की तरह चला रहे हैं जम्मू-कश्मीर में प्रमुख विपक्षी पार्टी पीडीपी मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा की जेबी पार्टी की तरह चलती है। इनमें से किसी की भी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का मतलब है मुलायम सिंह, उनके बेटे और भाइयों की पार्टी। लालू प्रसाद यादव ने तो बिहार में अपनी जगह अपनी पत्नी राबडी देवी को ही मुख्यमंत्री बनाकर साफ संकेत दे दिया था कि पार्टी में और किसी की कोई कदर नहीं है।
धुर दक्षिण में द्रविड आंदोलन एक-दो परिवारों का शगल बनकर रह गया है। द्रमुक तो करूणानिधि की बपौती बनी हुई है और अन्नाद्रमुक में जयललिता का एकछत्र राज्य है। आंध्र प्रदेश में तेदेपा की स्थापना एन.टी. रामराव ने की थी। अब उनके दामाद चन्द्रबाबू नायडु पार्टी को पारिवारिक जागीर की तरह चला रहे हैं। उडीसा में बीजू जनतादल और कुछ नहीं नवीन पटनायक के रू प में पटनायक परिवार का ही विस्तार है।
भाजपा के नीचे लुढकने और उसकी नीतियों की कटु आलोचना के बावजूद यह कहा जा सकता है कि उसमें अन्य पार्टियों की तरह वंशवाद नहीं पनपा है। लेकिन उसके अनेक नेताओं के बेटे-बेटी पार्टी का टिकट लेने में सफल रहे हैं। इनमें नवीनतम नाम प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन का लिया जा सकता है। यह परम्परा अच्छी नहीं है। इस पर लगाम लगनी ही चाहिए, लेकिन इस पर लगाम लग पाएगी, इसमें संदेह ही है। भाकपा और माकपा जैसी वामपंथी पार्टियां अब भी अपने कैडर को ही आगे बढाती हैं, वहां अभी तक वंशवाद नहीं है।
भारत तेजी से वंशवादी राजनीति का जीता-जागता प्रमाण बनता जा रहा है। लेकिन राजनीतिक वंशवाद पनपता तभी है जब मतदाता वोट देकर उन्हें जिताते हैं और पार्टी के कार्यकर्ता ही उन्हें शिखर तक पहुंचाते हैं। ऎसे मतदाताओं की कमी नहीं है जो पार्टी और नेता के परिवार में अन्तर नहीं कर पाते।
हरिहर स्वरू प
[लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं]

रावण


रामायण काल में दुनिया ने केवल एक रावण का सामना किया,लेकिन आज के दौर में ऎसे रावणों की कमी नहीं है, जो इंसानियत के दुश्मन बने हुए हैं। बुराई पर अच्छाई की
विजय के त्योहार दशहरे पर बात करें 10 मोस्ट वांटेड आतंककारियों की जो दुनिया के लिए दशानन बने हुए हैं। विजय पांडे्य की रिपोर्ट-

26/11
मुंबई हमले के सिलसिले में भारत ने इंटरपोल को 13 पाकिस्तानी नागरिकों की सूची सौंपी है। इन पर मुंबई हमले की साजिश रचने का आरोप है।
13000
से ज्यादा अपराधियों के खिलाफ दुनियाभर में इंटरपोल ने रेड कॉर्नर नोटिस जारी कर रखे हैं।

ओसामा बिन लादेन
परेशान मुल्क
अमरीका समेत कई देश
ओसामा बिन मोहम्मद बिन अवाद बिन लादेन दुनिया का नंबर वन मोस्ट वांटेड है। पाकिस्तान-अफगानिस्तान की धूल भरी पहाडियों को ठिकाना बनाए ओसामा के पीछे दुनिया की सबसे ताकतवर और अत्याधुनिक हथियारों से लैस सेना पडी है। जमीन पर अमरीका और ब्रिटेन के सैनिक और आसमान में जासूसी विमान ड्रोन और सुदूर अंतरिक्ष में जासूसी सैटेलाइट ओसामा की खोज में लगी हैं। लेकिन अल कायदा के सरगना ओसामा की पाप की लंका का पता लगाने में ये नाकाम रहे हैं। ओसामा 1998 में केन्या और तंजानिया के अमरीकी दूतावास के सामने हुए बम धमाकों में 200 लोगों की हत्या का दोषी है। अमरीका में 9/11 को हुए सबसे भयानक आतंकी हमले इसी ने करवाए। इसमें 3000 से ज्यादा निर्दोष अमरीकी और विदेशी नागरिक मारे गए। सिविल इंजीनियरिंग में डिग्री लेने वाला ओसामा दुनिया भर में निर्माण नहीं नरसंहार का इंजीनियर बन गया है। 52 साल के इस सऊदी नागरिक पर अमरीकी सरकार ने 25 मिलियन डॉलर का इनाम घोषित कर रखा है। हालांकि हाल ही में पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने ओसामा के मारे जाने का दावा किया है, लेकिन इसकी पुष्टि फिलहाल नहीं हो पाई है।

जोकिन गुजमान लोरिया
परेशान मुल्क
मैक्सिको
नशे की खौफनाक और काली दुनिया का सबसे कुख्यात सरगना है जोकिन गुजमान लोरिया। मैक्सिको का ये ड्रग माफिया अल चापो के नाम से भी जाना जाता है। एक बिलियन डॉलर की अकूत संपत्ति का मालिक अल चापो दुनिया के अमीरों की सूची में 701वें नंबर है। अपराध की दुनिया में 'बॉस' के नाम से कुख्यात चापो पश्चिमी मैक्सिको के दुर्गम और अबूझ पहाडी इलाके से अपनी पाप की लंका चलाता है। दुनिया में कोकीन के इस सबसे बडे काले कारोबारी का जाल अमरीका, मैक्सिको और कोलंबिया समेत कई मुल्कों में फैला है। हेरोइन और मारीजुआना का कारोबारी चापो कोलंबिया से मंगाए गए नशे के सामान को मैक्सिको के रास्ते अमरीका पहुंचाता है। अमरीका, मैक्सिको और इंटरपोल को इस ड्रग माफिया की तलाश है। पांच मिलियन डॉलर का इनामी सरगना 1993 में ग्वाटेमाला पुलिस के हत्थे चढा। इसके बाद करीब साढे सात साल तक इसने मैक्सिको की जेल से बदस्तूर नशे का काला कारोबार जारी रखा। 2001 में अमरीका को प्रत्यर्पण से कुछ ही दिन पहले चापो 78 आदमियों की मदद से लांड्री वैन में छिपकर जेल से भाग निकला।

अलीमजान टोख्टाखुनोब
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उज्बेकिस्तान
अविभाजित सोवियत संघ के उज्बेकिस्तान में जन्मा अलीमजाान टोख्टाखुनोब संगठित अपराध का कुख्यात सरगना है। अवैध हथियारों, ड्रग्स और चोरी की गाडियों को ठिकाने लगाने के काले धंधे का काला कारोबारी है। अंतरराष्ट्रीय खेलों से लेकर सौंदर्य प्रतियोगिताओं की फिक्सिंग में इसका दखल है। 2002 में विंटर ओलंपिक की स्केटिंग प्रतियोगिता में रूस के खिलाडियों के पक्ष में फैसला देने के लिए इसने एक जज को भारी-भरकम रिश्वत दी थी। रिश्वत लेने वाली महिला निर्णायक ने खुद ही इसका खुलासा किया था। दुनिया भर में फिक्सिंग के धंधे का यह सरगना इटली पुलिस के हत्थे चढा था लेकिन इटली सरकार ने बाद में उसे छोड दिया। तभी से पर्दे के पीछे रहकर यह अपना काला कारोबार चला रहा है। इटली पुलिस की गिरफ्त से छूटने के बाद यह अभी तक देखा नहीं गया है लेकिन यह माना जाता है कि अलीमजान रूस में कहीं छिपा हो सकता है।

मैटियो मेसिना डेनारो
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इटली
इटली में माफियाओं का नया गॉडफादर है 47 साल का मैटियो मेसिना डेनारो। डेनारो दुनिया भर में कुख्यात सिसली माफियाओं की दुनिया का नया कू्रर चेहरा है। पोर्श की चमचमाती स्पोर्ट्स कारों, रोलैक्स की हीरे जडी घडियों और महंगे रे बैन के चश्मों का शौकीन डेनारो खतरनाक और क्रूर कातिल है। इटली के माफिया परिवार में पैदा होने वाले डेनारो ने महज 18 साल की उम्र में पहला कत्ल किया था। अब तक ये खुद अपने हाथों से 500 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार चुका है। कई सालों से इटली पुलिस का ये सबसे मोस्ट वांटेड चेहरा है। लेकिन इटली पुलिस के पास माफियाओं के इस सरगना की सिर्फ 27 साल पुरानी एक तस्वीर है। करीब दो साल पहले इटली पुलिस ने इसी तस्वीर के आधार पर डेनारो की नई तस्वीर जारी की लेकिन आज तक उसका कोई सुराग नहीं मिल पाया है।

फेलिसिएन काबुगा
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रवांडा
रवांडा का ये अरबपति कारोबारी इंसानियत के सबसे भयावह नरसंहार का दोषी है। 1994 में 100 दिन तक चले भयानक नरसंहार में रवांडा में 80 हजार से ज्यादा लोगों की हत्या की गई। यहां तक मासूम बच्चों को भी नहीं बख्शा। तुत्सी आबादी के देश से सफाए के लिए शुरू हुए हुतु जाति के प्रभाव वाली सरकार के इस अभियान को अरबपति कारोबारी काबुगा ने भारी मदद की। अंतरराष्ट्रीय दखल के बाद जब तक ये कत्लेआम रूका तब तक रवांडा के कई परिवारों का नामोनिशान ही मिट गया। इस भयानक नरसंहार को 15 साल बीत चुके हैं लेकिन इंसानियत के सबसे बडे दुश्मन काबुगा का अब तक कोई सुराग नहीं लगा है। हालांकि अक्सर ऎसी खबरें आती है कि काबुगा केन्या में कहीं पनाह लिए हुए है।

जोसेफ कोनी
परेशान मुल्क
युगांडा, सूडान, कंागो
युगांडा का यह गुरिल्ला छापामार मासूमों का सबसे बडा दुश्मन है। युगांडा में शासन चलाने की मंशा रखने वाले इस शख्स ने दो दशक तक मध्य अफ्रीका के सूडान, कांगो और युगांडा में भयानक आतंक मचाए रखा। लार्ड रेजीस्टेंस आर्मी के सुप्रीमो कोनी ने इस लडाई में हजारों मासूमों को झोंका। इसने तकरीबन 60 हजार बच्चों को गुरिल्ला युद्ध में झोंक दिया। इन मासूमों के हाथ में बंदूक थमाकर इनसे हत्या, रेप जैसे जघन्य अपराध करवाए। इसके चलते तीनों देशों के 20 लाख से ज्यादा लोगों को शरणार्थियों जैसी जिंदगी बितानी पड रही है। कांगो के बडे इलाकों में इसकी पाप की लंका बसी हुई है। 2008 में युगांडा, कांगो और सूडान की सेनाओं ने इसके खिलाफ जबरदस्त अभियान छेडा। इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ने इस भयानक अपराधी के खिलाफ वारंट जारी कर रखा है।

ओमिद तहविली
परेशान मुल्क
अमरीका
अडतीस साल के इस शख्स को अमरीका के साथ कनाडा पुलिस शिद्दत से तलाश रही है। कनाडा में पाप का काला कारोबार कर रहे ईरानी माफियाओं के परिवार का ये युवक जितना शातिर दिमाग है उससे ज्यादा कू्रर भी। ईरान से 1994 में यह कनाडा पहंुचा। इसके महज पांच साल बाद इसने टेलीमार्केटिंग का फर्जी कारोबार शुरू किया। महज तीन साल में इसने हजारों अमरीकी नागरिकों को तीन मिलियन डॉलर से ज्यादा का चूना लगाया। 2005 में अपने ही एक आदमी के अपहरण और शारीरिक शोषण के मामले में ये कनाडा पुलिस के हत्थे चढा। इसे 11 साल की सजा हुई। लेकिन जेल की सलाखें इसे महज दो साल ही कैद रख पाई। 2007 में एक जेल कर्मचारी को 50 हजार डॉलर देने का झांसा देकर ये जेल से भाग निकला। अब दुनिया के दो बडे मुल्कों की पुलिस इसके पीछे है।

जेम्स व्हाइटी
परेशान मुल्क
उत्तरी अमरीका और यूरोप
ड्रग्स और जबरन उगाही के काले कारोबार का सरगना जेम्स व्हाइटी उम्रदराज अपराधी है। विंटर हिल गैंग का सरगना जेम्स तकरीबन 50 मिलियन डॉलर की संपत्ति का मालिक है। जुर्म की काली दुनिया के इस सरगना पर अपने रास्ते में आने वाले हर शख्स की बेरहमी से हत्या करने का भी आरोप है। इसके संबंध उत्तरी अमरीका और यूरोप के हर बडे अपराधी गिरोह से हैं। अमरीकी फेडरल जांच एजेंसी को पिछले एक दशक से इस शातिर अपराधी की तलाश है, लेकिन 78 साल का व्हाइटी एफबीआई की पकड से दूर है। दुनिया के कई अपराधी संगठनों के साथ मिलकर इसका काला कारोबार बदस्तूर जारी है। जेम्स व्हाइटी फिलहाल किस देश में बैठकर अपना काला कारोबार चला रहा है, इसका पता अमरीका की तेजतर्रार पुलिस को भी नहीं है।

दाऊद इब्राहिम
परेशान मुल्क
भारत
महाराष्ट्र के कोंकण इलाके में एक कांस्टेबल के घर पैदा हुआ शेख दाऊद इब्राहिम कास्कर भारत का मोस्ट वांटेड अपराधी है। छोटे-मोटे अपराधों से पाप की दुनिया में एंट्री करने वाला दाऊद आज दुनिया के सबसे बडे संगठित गिरोह डी कंपनी की कमान संभालता है। 1993 मुंबई में थर्रा देने वाले बम धमाके करवाने के बाद ये भारत छोडकर भाग निकला। अब इसने पाकिस्तान के करांची शहर को अपना ठिकाना बना रखा है। पाकिस्तान की कुख्यात एजेंसी आईएसआई के संरक्षण में फिलहाल महफूज है। पाकिस्तान से ही बैठकर दाऊद आतंकवाद, नकली नोटों, नशीले पदाथोंü के काले कारोबार को संचालित करता है। भारत के मोस्ट वांटेड दाऊद की तलाश इंटरपोल को भी है। अमरीका ने 2003 में इसे ग्लोबल आतंकी घोषित किया।

हाफिज मोहम्मद सईद
परेशान मुल्क
भारत
आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा के सुप्रीमो हाफिज मोहम्मद सईद भारत का दुश्मन नंबर दो है। हाफिज के पुरखे भारत से ही पाकिस्तान गए। भारत विभाजन के वक्त पाकिस्तान जाते हुए इसके परिवार के 36 लोग मारे गए थे। भारत पाक विभाजन के तीन साल बाद पैदा हुए हफीज के दिलोदिमाग में भारत के खिलाफ कूट-कूटकर जहर भरा हुआ है। मुंबई के 7/11 हमलों के पीछे इसी का हाथ है। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ मिलकर इसने मुंबई हमलों की साजिश रची। इंटरपोल ने इसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी कर रखा है।

आतंक का अंत
2009 एशिया में आतंक के दो बडे रावणों के खात्मे का भी साल है। अपनों के बीच हीरो और विरोधियों के बीच विलेन की छवि वाले इन सरदारों के साम्राज्य के खात्मे में उनके अपने ही विभीषण बने।

वेलुपिल्लई प्रभाकरण
दुनिया के ताकतवर गुरिल्ला प्रमुख प्रभाकरण 18 मई 2009 को श्रीलंकाई सेना ने मार गिराया। नेपोलियन, सिंकदर, सुभाषचंद्र बोस और भगत सिंह से प्रभावित प्रभाकरण श्रीलंका में तमिल हितों की हिंसक लडाई लड रहा था। आतंकवाद, हत्या और संगठित अपराध के लिए इंटरपोल ने 1990 में प्रभाकरण को वांटेड घोषित किया था। श्रीलंकाई मीडिया रिपोर्ट की मानें तो कभी प्रभाकरण का दाहिना हाथ रहा उसका कमांडर करूणा श्रीलंकाई सेना के साथ मिलने की वजह से प्रभाकरण मारा गया।

बैतुल्लाह महसूद
पाकिस्तान का मोस्ट वांटेड बैतुल्लाह महसूद अगस्त महीने की पांच तारीख को मारा गया। 25 करोड रूपए का इनामी आतंकी सरदार अपने ससुर के घर अमरीकी मानवरहित ड्रोन विमानों के हमले में मारा गया। अमरीकी मीडिया रिपोर्ट की मानें तो पाकिस्तान के इस रावण के लिए विभीषण बना उसका ससुर। उसी ने अमरीकी सेना को बैतुल्लाह के अपने यहां होने की खुफिया सूचना दी थी। पाकिस्तान के वजीरिस्तान इलाकों का कू्रर कबीलाई सरगना बैतुल्लाह महसूद पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या का भी दोषी था।

हमारे पडोशी देश

इतिहास गवाह है कि भारत पड़ोसी देशों से कई बार ग़च्चा खा चुका है। वह पड़ोसियों की हरकतों से लगातार परेशान है। इन दिनों सीमा पर चीन की गतिविधियां ज्यादा चर्चा में हैं। सवाल उठता है कि क्या चीनी घुसपैठ या छोटी-मोटी झड़पें युद्ध का रूप ले सकती हैं? भारत को परेशान करने की चीनी रणनीति का तोड़ आख़िर क्या है..?

चीन को लेकर भारत में अजीब-सी स्थिति पैदा हो गई है। ऐसा लगता है कि जनता जाग रही है और सरकार सो रही है। सीमा पर चीन क्या-क्या हरकतें कर रहा है, यह जानने के जितने साधन जनता के पास हैं, उनसे कहीं ज्यादा सरकार के पास हैं। जनता को जगाने वाले सिर्फ़ अख़बार और टीवी चैनल हैं।

अख़बार और टीवी कहते हैं कि चीनी सैनिक हमारी सीमाओं में घुसकर हमारे नागरिकों को तंग करते हैं, चट्टानों पर चीन का नाम लिख देते हैं, उन्होंने भारत-तिब्बत सैन्य-दल के दो जवानों को मार दिया है और वे हमारी सीमाओं में बंकर भी खड़े कर रहे हैं। भारत सरकार का प्रवक्ता कहता है कि ये सब ख़बरें निराधार हैं। सरकार को अख़बार और टीवी की ख़बरें तो उपलब्ध हैं ही, उसके पास अनेक गुप्तचर संस्थाएं हैं, स्थानीय प्रशासन है और नागरिक हैं, जो उसे बराबर ख़बरें देते रहते हैं। ऐसे में किस पर भरोसा किया जाए?

साधारणत: सरकार पर भरोसा करने का ही मन बनता है, लेकिन हमारी सरकारें पड़ोसी देशों से इतनी बार गच्चा खा चुकी हैं कि आम जनता में बेचैनी फैल रही है। यदि सरकार सतर्क होती, तो मुंबई-हमला ही क्यों होता? आतंकवादियों को समुद्र-तट पर ही दबोच लिया जाता। आख़िर करगिल-युद्ध कैसे शुरू हुआ? कई महीनों से चली आ रही घुसपैठ की पाकिस्तानी तैयारियों का हमारी सरकार को कुछ पता ही नहीं चला। 1948 में यदि कश्मीर के चरवाहों ने शोर नहीं मचाया होता, तो श्रीनगर पर भी पाकिस्तान का कब्जा हो जाता।

1962 का युद्ध अचानक नहीं हो गया था। उसकी तैयारी चीन 12 साल से कर रहा था। 1957 में खुर्नाक के किले पर जब हमारे जवानों के शव चीन ने हमें सम्हलाए, तो भी हमारी नींद नहीं खुली। हिंदी-चीनी भाई-भाई की खुमारी में हम अपना कर्तव्य भूल गए। वही दुखद पटकथा अब दुबारा तो नहीं लिखी जा रही है?

शायद नहीं! इसीलिए भारत सरकार बार-बार कह रही है कि सीमा पर कोई झड़पें नहीं हुई हैं, भारत-तिब्बत दल के कोई जवान नहीं मारे गए हैं, चट्टानों पर चीनी भाषा जरूर लिखी है लेकिन ‘चीन’ नहीं लिखा हुआ है और दोनों तरफ के स्थानीय कमांडरों के बीच संपर्क बना हुआ है। भारत सरकार ऐसा क्यों कह रही है? वह उत्तेजित क्यों नहीं है? इसके कारण स्पष्ट हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि दोनों दशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा अभी तक खींची नहीं गई है, जैसी कि भारत और पाकिस्तान के बीच है।

जंगलों, पहाड़ों, नदियों और झीलों के आर-पार मोटी-मोटी पहचानों के आधार पर सीमाएं मान ली जाती हैं। मानी हुई सीमाओं के दोनों तरफ प्राय: बस्तियां नहीं होतीं, लोग नहीं रहते, सैनिक शिविर नहीं होते। ऐसे में गश्त लगाते हुए एक देश की सैनिक टुकड़ियां दूसरे देश की सीमा में चली जाती हैं। यह अनजाने में भी हो जाता है और कभी जान-बूझकर भी। चीनी अख़बार अक्सर आरोप लगाते रहते हैं कि भारतीय टुकड़ियां चीनी-सीमा में घुस आती हैं।

इस तरह की घटनाएं भारत-पाक सीमांत पर तो अक्सर होती रहती हैं और वहां तो ऐसा दोनों पक्षों की तात्कालिक सहमति से भी हो जाता है, क्योंकि दोनों पक्ष एक-दूसरे की भाषा समझते हैं। भारत और चीन के बीच ऐसी घटनाएं स्थानीय नहीं रह पातीं। वे तूल पकड़ लेती हैं। भारत सरकार इन घटनाओं को अनावश्यक तूल नहीं देना चाहती, लेकिन यदि वह बिल्कुल ही मौन रहेगी, तो यह ग़लत होगा। यह उदासीन रवैया चीन को ज्यादती करने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

भारत सरकार को यह पता है कि हमारे पूरे अरुणाचल प्रदेश को चीन अपना हिस्सा मानता है और लद्दाख में भी उसने लंबे-चौड़े दावे ठोक रखे हैं। यदि भारत सरकार उसकी इन छोटी-मोटी घुसपैठों पर लीपा-पोती करती रहेगी, तो वह प्रकारांतर से चीनी दावों को मजबूत करेगी। चीन से जरा-सा औपचारिक विरोध जताने में भी हमें डर क्यों लगता है? क्या चीन युद्ध छेड़ देगा?

चीन को पता है कि यह 1962 नहीं है। भारत की कुल सैन्य-शक्ति काफी बढ़ी है और भारतीय सीमांत पर उसकी सतर्कता अपूर्व है। इसके अलावा आज का चीन अब से 45-50 साल पहले के चीन से बिल्कुल अलग है। वह दादागीरी छोड़कर बनियागीरी में लग गया है। वह दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारी राष्ट्र बनने की फ़िराक में है। भारत-जैसे पड़ोसी से युद्ध मोल लेकर वह सारी दुनिया में बदनाम होना पसंद नहीं करेगा। भारत के साथ ही उसका व्यापार इस वर्ष 60 अरब डॉलर को छूने वाला है। वह भारत के विदेश व्यापार का सबसे बड़ा भागीदार बन गया है।

विश्व-व्यापार के क्षेत्र में दुनिया के मालदार देशों की तिकड़मों के विरुद्ध उसने भारत के साथ साझा-मोर्चा भी बना रखा है। उसे पता है कि भारत के साथ युद्ध करके उसे भयंकर आर्थिक नुक़सान भुगतना पड़ सकता है। वह यह भी जानता है कि अरुणाचल और लद्दाख की निर्जन और बंजर जमीन के कुछ हिस्से झपट लेने से उसे कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होने वाला है। वह पहले ही भारत से बहुत बड़ा है और कुछ लाख भारतीयों को जोड़ लेने से सवा अरब के समुद्र में कौन-सा छौंक लगने वाला है?

इसके अलावा लोकतंत्र और हिंदी के शौक़ीन ये भारतीय चीन के पाचन-तंत्र को चौपट कर देंगे। इसलिए चीन हमारे सीमांत पर छोटी-मोटी चिउंटियां काटता रहता है, ताकि उसका संवैधानिक दावा बना रहे। इसी कारण चीन दलाई लामा के अरुणाचल जाने का विरोध करता है। उसका कहना है कि वह चीन का प्रदेश है, उसमें चीन का दुश्मन दलाई लामा कैसे जा सकता है? चीन तो भारतीय प्रधानमंत्री को भी अरुणाचल न जाने की सलाह दे रहा था। यह चीन की हिमाक़त है। अफ़सोस है कि चीन की इस हिमाक़त का जवाब भारत सरकार बहुत ही नरम शब्दों में देती है। क्यों देती है? वह क्या करे?

वह तिब्बत को चीन का प्रदेश मान चुकी है। वरना वह भी चीन के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के तिब्बत जाने का विरोध कर सकती थी। भारत सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत को चीन की जितनी जरूरत है, उतनी ही चीन को भारत की जरूरत है। यदि भारत चीन के हर पैंतरे का तुर्की-ब-तुर्की जवाब दे, तो चीन क्या कर लेगा? यदि भारत ऐसा नहीं करेगा, तो धीरे-धीरे चीन दक्षिण एशिया के सभी देशों में भारत की नींव खोखली कर देगा। क्यों न कर देगा?

कौटिल्य के अनुसार तो किसी भी शक्तिशाली राष्ट्र का यह राजधर्म है। चीन अपने राजधर्म का निर्वाह निष्ठापूर्वक कर रहा है। उसने भारत के चारों तरफ घेरा डालने की कोशिश की है। पाकिस्तान को भारत के खिलाफ़ खड़ा करने की जितनी लगातार कोशिश चीन ने की है, अमेरिका ने भी नहीं की। चीन की पाकिस्तान-नीति का शीत-युद्ध से कोई लेना-देना नहीं रहा। उसका तो सिर्फ़ एक ही सूत्र रहा- भारत-विरोध! चीन ने पाकिस्तान को परमाणु तकनीक और मिसाइलें दीं, हर युद्ध में भारत के विरुद्ध समर्थन दिया और अब उसने बलूचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह भी बना दिया है।

नेपाल के माओवादियों की पीठ ठोकने में चीन कोई कसर नहीं छोड़ रहा, क्योंकि वे भारत-विरोधी हैं। म्यांमार में चीन ने इतने पांव पसार लिए हैं कि रंगून की सैनिक सरकार भारत को गैस देने के लिए तैयार नहीं है। बांग्लादेश अपनी सीमा में से पाइपलाइन नहीं आने देना चाहता। श्रीलंका की सरकार को भारत से विमुख करने के लिए चीन ने वहां बंदरगाह बनाने, हथियार देने और तकनीकी सहायता के लिए अपनी थैली के मुंह खोल दिए हैं।

भारत ने अफ़गानिस्तान को यदि 1.2 अरब डॉलर की सहायता दी है, तो चीन ने 3.5 अरब डॉलर देकर तांबे की खदान ख़रीद ली है। रूस के सखालिन द्वीपों में निकल रहा अकूत तेल कहीं भारत के हाथ न लग जाए, चीन इस चिंता में दुबला हुआ जा रहा है। चीन भारत को सुरक्षा-परिषद का स्थायी सदस्य भी नहीं बनने देना चाहता, उसने अरुणाचल को मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय सहायता में भी अड़ंगा डालने की कोशिश की है और वह परमाणु आपूर्ति क्लब में भी भारत के विरुद्ध मोर्चा लगाए हुए है। ऐसा लगता है कि चीन पूरे एशिया का दादा बनने को आमादा है।

चीन की इस एकध्रुवीयता की एकमात्र चुनौती भारत ही है, क्योंकि भारत लोकतंत्र है, आर्थिक और सामरिक दृष्टि से समर्थ है और आजकल वह अमेरिका से भी घनिष्टता बनाए हुए है। इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखें, तो सीमांत की छुट-पुट घटनाओं के अर्थ कुछ अलग ही नजर आएंगे। लेकिन इस नजरिए के आधार पर क्या हमारा विदेश मंत्रालय कोई वैकल्पिक रणनीति बना रहा है? वैकल्पिक रणनीति का अर्थ चीन के प्रति आक्रामक होना नहीं है। लेकिन हमारी कूटनीतिक उदासीनता लंबे दौर में भारत के लिए बहुत मंहगी पड़ सकती है।

Sunday, September 27, 2009

Justice Delayed


1- Vacannt Seat Of Judges
2- Hostile Witness
3- Fake Cases : Corrupt Indian Common People
4- Custodial Death : Close A Case To Open An New One
5- Delyed In Execution Of Summons : Police Doesn’t Want To Do It
6- Judges Holidays
7- Advocates Lazyness : wanna make more money by less work
8- Immature Judges
9- Abensence Of Concrete Limitations
10- Human right commison’s overreach
11- I AM THINKING MORE