Thursday, October 15, 2009

जातीवाद पर हमारा दोहरा रवैया

पिछले करीब चालीस साल से भारत में सरकारें इस बात को आधिकारिक तौर पर स्वीकारने से बचती आई हैं कि देश में जाति प्रथा का अस्तित्व है या नहीं। वर्ष 1965 से भारत ने नस्लीय आधार पर भेदभाव के उन्मूलन के लिए गठित संयुक्त राष्ट्र संघ की समिति की बैठकों में विरोधाभासी रवैया अपना रखा है। वह एक तरफ स्वीकार करता है कि जातिवाद के नाम पर भेदभाव मानवाधिकारों के उल्लंघन के समान है।



वहीं सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र संधि में से वह जाति शब्द को हटाना भी चाहता है। इसके बजाय भारत को स्वीकारना चाहिए कि उसके यहां जातिगत भेदभाव है और इसके खात्मे के लिए उसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के साथ सहयोग करना चाहिए। इस मसले पर दोहरापन अनुचित नीति है, जिससे भारतीय सरकारों को बचना चाहिए। हमारे यहां सभी राजनीतिक दलों की चुनावी रणनीति में जाति एक अहम कारक रहा है।



भारत की कई पीढ़ियां आरक्षण नीतियों की छाया में पली हैं और आज तक किसी सरकार ने इस पर सवाल नहीं उठाया। इसलिए जातिप्रथा से फायदा उठाने वाली हमारी राजनीतिक व्यवस्था द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसे एक राष्ट्रीय चिंता बताना एक प्रकार का ढोंग नहीं तो क्या है। जातिवाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का उल्लंघन है और देश के भीतर उससे लड़ने की एक मजबूत परंपरा भी रही है। सरकार दोनों ही तथ्यों से इनकार नहीं कर सकती।

Wednesday, October 14, 2009

नक्सलवाद

देश के विभिन्न राज्यों में नक्सलियों का आतंक बढता जा रहा है। बिहार और झारखंड समेत कुछ राज्यों में आहूत दो दिन के बंद के जरिए नक्सली अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहे हैं। पटरियां उखाड रहे हैं और हमले कर रहे हैं। नक्सलियों ने पिछले दिनों तो हद कर दी। झारखंड के सीआईडी (विशेष शाखा) के इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदूवार की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के नक्सलियों द्वारा बर्बरतापूर्वक सिर काटकर हत्या और उसके बाद गढचिरोली (महाराष्ट्र) जिले में 18 पुलिसकर्मियों की हत्या व एक व्यक्ति का सिर कलम करने की घटनाओं से देश भर में सदमे जैसा माहौल बन गया।

इन वारदातों से माओवादियों ने देश की जनता और सरकार को चेताया है कि वे अपनी क्रांति के लिए एक कदम और आगे बढाने को तत्पर हैं। विगत में भी नक्सली देश में ऎसे बर्बर नरसंहार कर चुके हैं। इसी साल मार्च में, एक तथाकथित जन अदालत (जो वास्तव में माओवादी कंगारू गुट है और खुद को कानून की अदालत कहता है) ने पुलिस का मुखबिर बताकर एक व्यक्ति का सिर कलम कर दिया था। जून 2008 में मुरगांव (गढचिरोली) में एक आत्म-समर्पित माओवादी का सिर भी धड से अलग कर दिया गया था। नक्सलियों ने झारखंड में अप्रेल 2007 में भी दो भाइयों की सिर काट कर हत्या कर दी थी, उन पर नक्सलियों को पुलिस का मुखबिर होने का शक था। इस तरह का अपराध करने वाले अपने कृत्य का औचित्य कुछ भी बताएं, इक्कीसवीं सदी में इस सभ्य समाज में ऎसे अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं है। खेद की बात है कि मनुष्य इतना पतित भी हो सकता है। लेकिन इसकी महज निंदा ही पर्याप्त नहीं है। ऎसे अमानवीय कृत्य करने वालों पर मुकदमे चलने चाहिए और उन्हें सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। खेदजनक है कि सोच समझकर ठण्डे दिमाग से ऎसी हत्याएं करने वाले फरार रहते हैं।

केन्द्रीय गृहमंत्री के अनुसार बीस प्रदेशों के 223 जिलों के लगभग दो हजार थाना क्षेत्रों में नक्सली सक्रिय हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि वर्ष 2008 में नक्सली हिंसा की 1591 वारदातें हुईं, जिनमें 721 लोग मारे गए थे। इस साल अगस्त के अन्त तक देश भर में नक्सली हिंसा में 580 लोग जान गंवा चुके हैं। नक्सलियों के निशाने पर विशेष रू प से पुलिसकर्मी रहते हैं झारखंड में पिछले साढे छह साल में इंस्पेक्टर इंदूवार 339वें पुलिसकर्मी हैं, जो नक्सली हिंसा का शिकार हुए हैं। दुख की बात यह है कि सरकार की घोर लापरवाही के कारण आज नक्सलियों का जाल देश भर में फैल गया है। चार साल पहले प्रधानमंत्री ने चेताया था कि नक्सली देश की सुरक्षा के लिए सबसे बडी चुनौती हैं। इसके बावजूद तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल इस संबंध में नीति तैयार करने और जरू री दिशा निर्देश देने में विफल रहे थे। अब जाकर कुछ नहीं करने और समस्या के स्वत: ही कम हो जाने की उम्मीद रखने की नीति में बदलाव आया है। अब नक्सलियों से निपटने की रणनीति बनाई जा रही है, कमियों को दूर करने और हथियारों व साजो-सामान की व्यवस्था की जा रही है। समन्वय व गुप्तचर व्यवस्था को बेहतर बनाया जा रहा है। इस तरह के कदम उठाने की जरू रत बरसों पहले ही थी और ऎसा नहीं करने की हमें बहुत बडंी कीमत चुकानी पडी है।

माओवादियों ने इस दौरान हमारी अकर्मण्यता का पूरा फायदा उठाया और अपना प्रभाव क्षेत्र बढा लिया व अपने गढों में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली। अत्याधुनिक हथियार जुटा लिए और गुप्तचरी व संचार ढांचा मजबूत कर लिया। उनके बढे हौसलों की परिचायक हैं जल्दी-जल्दी हो रही हिंसक वारदातें और जून 2009 में माओवादियों के पोलित ब्यूरो का 'युद्ध तेज करने का फैसला'। माओवादियों ने जवाबी हमले तेज करने और अपने संघर्ष को नए इलाकों में फैलाने का भी फैसला किया है ताकि 'दुश्मन' की ताकत बंट जाए और वह उनके ठिकानों पर हमले से बाज आए। केन्द्र और विभिन्न प्रदेशों की सरकारें ने दीपावली के बाद नक्सलियों के विरूद्ध बडा अभियान छेडने का फैसला किया है, संभवत: इसी को ध्यान में रखकर माओवादियों ने उक्त फैसला किया है। इस अभियान को 'ग्रीन हंट' नाम दिया गया है। सुरक्षा पर गठित मंत्रिमंडलीय समिति की 8 अक्टूबर को हुई बैठक में समझा जाता है कि नक्सलियों के खिलाफ बडा अभियान छेडने को मंजूरी दे दी गई है। समय रहते कार्रवाई में विफल रहने की देश ने खर्चे और लोगों की जान दोनों दृष्टि से बहुत महंगी कीमत चुकाई है। वर्ष 1971 में प. बंगाल के चार, बिहार के तीन और उडीसा का एक जिला नक्सली आंदोलन की चपेट में था।

तब स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ ने 45 दिन तक अभियान चलाकर इस आंदोलन को खत्म किया था। नक्सलियों को घेरे से बाहर नहीं निकलने देने के लिए सेना ने बाहरी घेराबंदी की थी। स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ ने तलाशी अभियान चलाया था। अब 223 जिलों में नक्सलियों से निपटना है। अब तो नक्सलियों के पास अत्याधुनिक हथियार भी हैं। वे अपनी ताकत साबित कर चुके हैं। नक्सल-प्रभावित राज्यों में अगले तीन साल में विकास कार्यो पर सात खरब 30 अरब रूपए की विशाल धनराशि खर्च की जाएगी। प्रभावित इलाकों को नक्सलियों से मुक्त कर वहां सिविल प्रशासन कायम किया जाएगा और विकास कार्य प्राथमिकता से कराए जाएंगे। शुरू में छत्तीसगढ, झारखंड, उडीसा और महाराष्ट्र के 6 जिलों में यह अभियान चलेगा। इसमें सेना की मदद नहीं ली जाएगी, लेकिन जरू रत पडने पर राहत, बचाव और कार्रवाई के लिए उसे तैयार रखा जाएगा।

नक्सली भागकर दूसरे राज्यों में नहीं जा छिपें, इसके समुचित प्रबंध किए जाएंगे। इस अभियान की सफलता विभिन्न प्रदेशों की पुलिस के बीच बेहतर समन्वय पर निर्भर करेगी। आम लोगों को इस अभियान में मदद के लिए आगे आना चाहिए। साथ ही पुलिस को मानवाधिकारों के उल्लंघन से बचते हुए अनुशासन के उच्च मानदंडों को अपनाना होगा। इस युद्ध में विद्रोहियों की पराजय के साथ ही दिल जीतना महत्वपूर्ण होगा।

अरूण भगत
[लेखक गुप्तचर ब्यूरो के निदेशक रहे हैं]

cheen ke prati सचेत रहना होगा

भारत आज एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। उसे अपनी क्षमता सिद्ध करते हुए शिखर पर भी पहुंचना है और स्वाभिमान भी बनाए रखना है। सरकार चलाना और नेतृत्व देना एक बात नहीं है। सरकार में फाइलों के, नेताओं और अघिकारियों के पेट भरे जाते हैं। उस धन को हमारे यहां धूल कहा जाता है। नेतृत्व इसे ठोकर पर रखता हुआ कफन बांधकर निकलता है। अपने संकल्प के सहारे। आज संकल्पविहीनता की स्थिति है। कोई दूरगामी निर्णय होते ही नहीं। हमारे अघिकारियों को दौरे करने और हाथ मिलाने का बडा शौक है। भले ही पीछे से कोई छुरा मार दे। पिछले साठ साल में हमने केवल पडोसियों की शत्रुता कमाई है। देश के टुकडे किए हैं।

हमारे देश में जो कुछ हो रहा है, धर्म और जाति के नाम पर देश खण्ड-खण्ड हो रहा है, देश के भीतर विषाक्त वातावरण फैल रहा है। जनता में जितनी त्राहि-त्राहि मच रही है, पडोसी देश जिस प्रकार मित्रता भुलाकर शत्रु बनते जा रहे हैं, निर्णय लेने के बजाए गम्भीर से गम्भीर मुददों को टाला जा रहा है, देश में अनिर्णय की स्थिति बढती जा रही है, इन सबका एक ही कारण है - देश में कोई नेता नहीं है। किसी भी पार्टी ने देश को नेता नहीं दिया। सबकी नेतागिरी अपनी-अपनी पार्टी तक सिमटी हुई है। चाहे लालकृष्ण आडवाणी हो या सोनिया गांधी। ऎसे ही हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हो गए हैं। इनके आह्वान पर देशवासी किसी मुददे पर कोई पहल नहीं कर सकते। आज जनप्रतिनिघि स्वयं कार्यपालिका पर अघिक निर्भर करते हैं। कार्यपालिका टालमटोल करने के लिए जग प्रसिद्ध है। कुर्सी और नेतृत्व में अन्तर होता है। नेता सभी दलों से ऊपर होता है। उसके समक्ष केवल राष्ट्रहित होता है। इसी के लिए वह जीता है, मरता है। मैंने राहुल गांधी से भी यही कहा था कि उन्हें देश को नेतृत्व देना चाहिए। कांग्रेस को नहीं। कांग्रेस उनके लिए सीढी का कार्य करे, तब कुछ बात बनेगी। वरना उनके साथ भी कांग्रेस का वही सम्बन्ध रहेगा जो पिछली पीढियों के साथ रह चुका है।

देश का दुर्भाग्य है कि विदेश सेवा के अघिकारी केवल यही सपना देखते रहते हैं कि उन्हें कहां का राजदूत बनाया जा रहा है। उन्हें देशहित में तपस्या करने की तैयारी दिखानी चाहिए। इन दिनों चीन और पाकिस्तान दोनों ही हमारे सामने खडे दिखाई दे रहे हैं। दोनों ने ही आजादी के बाद से अब तक समय-समय पर हमारा दोहन ही किया है, हम मौन बने बैठे हैं। क्या मार्गदर्शन किया विदेश विभाग ने। वह इसी बात से प्रसन्न है कि पाकिस्तान से हमारे रेल और बस मार्ग जुड गए। कश्मीर के जरिए व्यापार के रास्ते खुल गए। चीन से हमारा व्यापार सन् 2010 तक 30 अरब अमरीकी डॉलर हो जाएगा। साथ में भले हमारी 30 हजार बीघा जमीन दबा ले। कोई नेता देश के प्रति संकल्पवान ही दिखाई नहीं देता। ढुलमुल नीतियां चल रही हैं। शत्रुता को भी झेल रहे हैं। वार्ताएं भी जारी हैं। एक भी नेता ने स्पष्ट नहीं किया वह देश के हित में क्या करना चाहता है, जिसमें सभी देशवासी सहयोग करें। बकरी रोए जान को, खटीक रोए खाल को। सबसे दयनीय स्थिति यह है कि हम रोज यह जानकारियां दे रहे हैं कि पाकिस्तान और चीन क्या कर रहा है, किन्तु देशवासियों को नहीं पता कि भारत क्या कर रहा है।

पिछले साठ साल में भारत की विदेश नीति के कारण आज सभी पडोसी देश शत्रु बन गए। शत्रु ही क्यों लगभग सभी चीन के साथ मित्रता का जामा पहन चुके हैं। आज चीन के पास भारत में प्रवेश के लिए भले ही एकमात्र पाकिस्तान हो, आने वाले समय में यह सभी पडोसी देश चीन के लिए भारत प्रवेश का मार्ग बन जाएंगे। क्या हम इसे उपलब्घि मान सकते हैं। इसको देखकर लग रहा है कि सरकार के निर्णयों की प्रतीक्षा किए बिना ही देशवासियों को कुछ निर्णय ले लेने चाहिए। देश की सम्प्रभुता के हित में। आज चीन ने जो कुछ हमारे साथ किया है, वह 1962 की ही पुनरावृत्ति है। सुरक्षा परिषद की सदस्यता के मुद्दे पर भी सबसे बडा विरोध चीन ही कर रहा है। एक धोखा पं. नेहरू खा चुके हैं फिर हम छाछ को फू ंककर क्यों नहीं पी रहे हम जानते हैं कि वहां निर्णय लिए जाते हैं, हमारे यहां टाले जाते हैं। अत: हमें भी तुरंत प्रभाव से चीनी उत्पादों का बहिष्कार कर देना चाहिए। किसी 'स्वदेशी अपनाओ' या 'भारत छोडो' नारे की आवश्यकता नहीं है। चीनी नागरिकों को भारत में प्रवेश करने से रोक देना चाहिए। चीनी सहयोग से चलने वाले उद्योगों को भी बन्द कर देने के लिए दबाव डालना चाहिए। यह तब तक जारी रहना चाहिए जब तक चीन हमारी जमीन छोडकर वापस न लौट जाए।

गुलाब कोठारी

विकास के पीछे का सच

हाल ही जारी संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2009 में 182 देशों की सूची में भारत को 134वां क्रम दिया गया है। मानव विकास सूचकांक के तहत जीवन की प्रत्याशा, शैक्षिक प्राप्ति, वास्तविक आय, स्वास्थ्य सेवाएं तथा सामाजिक सुरक्षा की उपलब्धियों को मापा गया है। इन मापदंडों पर भारत के लोग गुणवत्तापूर्ण जीवन और खुशहाली में पीछे हैं। भारत के मुकाबले कुछ पडोसी देशों की स्थिति बेहतर है। चीन 92वें स्थान पर है, जबकि श्रीलंका और भूटान जैसे छोटे देश क्रमश: 102 और 132वें क्रम पर हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल भारत से खराब हालत में हैं। भारत पिछले तीन साल से मानव विकास सूचकांक में लगातार फिसल रहा है। पिछले वर्ष भारत को 128वें क्रम पर रखा गया था। मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट ही नहीं कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट यह बता रही है कि भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब, सबसे ज्यादा निरक्षर, सबसे ज्यादा बीमार और सबसे ज्यादा बेरोजगार हैं।यकीनन यदि कोई व्यक्ति भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बढते हुए ग्राफ को देखे तो वह यही कहेगा कि भारत तेजी से छलांगें लगाकर आर्थिक विकास कर रहा है और देश के लोगों की जेब भारी होती जा रही है। भारत सरकार के केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के वर्ष 2008-09 के आंकडों के अनुसार देश के इतिहास में पहली बार प्रति व्यक्ति मासिक आय 3,000 रूपए के आंकडे को पार कर गई है। प्रति व्यक्ति वार्षिक आय बढकर 37,490 रूपए हो गई है। ब्रिटेन के इंस्टीट्यूट ऑफ डवलपमेंट स्टडीज (आईडीएस) के नवीनतम अध्ययन में यह बात कही गई है कि भारत में लगातार शानदार आर्थिक विकास हो रहा है, पिछले तीन वर्षो में जीडीपी बढने और आर्थिक विकास की दृष्टि से दुनिया के विकासशील देशों में चीन के बाद भारत का नम्बर है। भारत की विकास दर पिछले तीन वर्षो में नौ प्रतिशत और मंदी के वर्ष 2008-09 में भी छह प्रतिशत रही है। लेकिन ऎसी चमकीली विकास दर और ऊंची जीडीपी के बाद भी भारत में मानवीय विकास की दयनीय स्थिति के पीछे सबसे प्रमुख कारण आर्थिक विकास के लाभ देश के आम आदमी तक नहीं पहुंच पाना है। देश की जीडीपी में देश की जनसंख्या का भाग देने से प्राप्त होने वाली प्रति व्यक्ति औसत आय तो बढी हुई दिखाई दे रही है, लेकिन वास्तविक रूप में देश के 95 प्रतिशत लोगों को न्याययुक्त आय नहीं मिल रही है। तेज विकास के लाभ देश के पांच प्रतिशत लोगों की मुटि्ठयों में सीमित हो रहे हैं। आर्थिक विकास से भारत के उच्च मध्यम वर्ग के कोई पांच करोड लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और खासतौर से भारतीय कॉरपोरेट जगत के 50-55 लाख लोगों की आर्थिक स्थिति ज्यादा मजबूत हुई है।एस.डी. तेंदुलकर की अध्यक्षता में गठित भारत सरकार की समिति ने अगस्त 2009 में बताया है कि देश में 38 करोड लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं और पिछले 10 वर्षो में गरीबी रेखा के नीचे 11 करोड लोग और जुड गए है। देश में अब भी 88 करोड लोग प्रतिदिन दो डॉलर से भी कम आय में गुजारा कर रहे हैं। कम आय वर्ग के लोगों की 80 फीसदी आय उनकी भोजन, ऊर्जा जैसी जरूरतों की पूर्ति में खर्च हो जाती है और उनके पास अन्य आवश्यकताओं के लिए काफी कम रकम बचती है। खराब स्वास्थ्य और बीमारी के कारण लोग गरीबी के गहरे दुष्चक्र में फंस जाते हैं। हमें मानव विकास सूचकांक 2009 में पहले, दूसरे और तीसरे क्रम पर चमकते हुए नार्वे, ऑस्ट्रेलिया और आइसलैंड से यह सबक लेना होगा कि वहां तेज विकास दर से ज्यादा जरूरी लोगों की खुशहाली को माना गया है। हमें फ्रांस के नए आर्थिक दर्शन से सबक लेना होगा कि जीडीपी घटते जाना चिंता की बात नहीं है, लेकिन आम आदमी की खुशहाली को देश की आत्मा मानना चाहिए। हमें भी देश की खुशहाली को ऊंची जीडीपी से ज्यादा आम आदमी के चेहरे की मुस्कुराहट से मूल्यांकित करना होगा। हमें जीडीपी बढाने के प्रयास के पहले यह ध्यान देना होगा कि देश के लोग वास्तव में स्वस्थ, शिक्षित सुखी और प्रसन्न रहें। हमें ऊंची विकास दर, अरबपतियों की बढती संख्या और आर्थिक विकास की तेज रफ्तार पर खुश होने के साथ-साथ आर्थिक विषमता और समाज के आम आदमी के दुख-दर्द से सम्बन्घित भयावह तस्वीर को खुशनुमा बनाने पर ध्यान देना होगा। हमें वैश्वीकरण की चकाचौंध में गरीबों की बुनियादी जरूरतों की यथेष्ट पूर्ति पर ध्यान देकर गरीबों की कार्यक्षमता बढानी होगी। आम आदमी और गरीबों की खुशहाली से जुडी रोजगार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं से सम्बन्घित सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीरता से ध्यान केंद्रित करना होगा। हमें आर्थिक सामाजिक कल्याण की योजनाओं में हरसंभव तरीके से भ्रष्टाचार रोकना होगा और योजनाओं के संसाधनों के कुशल प्रबंधन से आम आदमी तक आर्थिक-सामाजिक कल्याण के अधिकतम लाभ पहुंचाने होंगे। देश के मानव विकास सूचकांक को नई ऊंचाई देने के लिए केंद्र सरकार अपनी तीन अति उपयोगी नई महत्वाकांक्षी योजनाओं को गति प्रदान करे। गांवों में रोजगार की सच्ची खुशियों के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को और अधिक उपयोगी बनाना होगा। देश के गरीबों को सामाजिक सुरक्षा की छतरी में लाने के लिए शुरू की गई नई पेंशन योजना को व्यावहारिक रूप देना होगा। अभावों से परेशान करोडों लोगों को रोटी की चिंताओं से बचाने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून को शीघ्रता से लागू करना होगा। ऎसा होने पर ही मानवीय विकास और जीवन स्तर के सर्वाधिक निचले पायदान पर खडे करोडों भारतीयों के चेहरे पर गुणवत्तापूर्ण जीवन की खुशहाली की मुस्कुराहट आ सकेगी और अगली मानव विकास सूचकांक रिपोर्टो में भारत का क्रम खुशहाली के साथ विकास करने वाले देशों की सूची में शामिल होने की संभावनाएं बढेंगी।जयंतीलाल भंडारी[लेखक ख्यात अर्थशास्त्री हैं]

Monday, October 12, 2009

निशाने पर दूतावास

काबुल में भारतीय दूतावास पर हुए आतंककारी हमले से अफगानिस्तान में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा की चिंता बढ गई है। वहां भारतीयों में दूतावास कर्मचारियों के अलावा विभिन्न विकास परियोजनाओं पर कार्यरत लोग भी हैं। इस आतंककारी हमले में बडी तादाद में अफगान नागरिक मारे गए। संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने भारतीय दूतावास पर हमले की भत्र्सना की है। सुरक्षा परिषद ने भी हमले को 'निंदनीय' बताते हुए इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है। तालिबान ने अपनी वेबसाइट पर कहा है कि उनके एक मरजीवडे ने भारी सुरक्षा बंदोबस्त वाले राजनयिक क्षेत्र में कार बम से आत्मघाती हमला किया था और उसके 'निशाने पर मुख्य रू प से भारत का दूतावास' था।काबुल में भारतीय दूतावास के बाहर पिछले गुरूवार को फटे इस विशाल बम के कारण 17 लोगों की मृत्यु हो गई और 76 घायल हो गए थे। दूतावास पर यह दूसरा हमला है, जिससे वहां सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो गया है। साथ ही इन हमलों में तालिबान और पाकिस्तान की भूमिका को लेकर फिर सवाल उठने लगे हैं। तालिबान ने हालांकि हमले की जिम्मेदारी ओढी है, लेकिन अफगान सरकार ने कहा है कि विदेशी सहायता के बिना ऎसा हमला सम्भव नहीं था। पिछले साल भारतीय दूतावास पर हुए हमले में 58 लोग मारे गए थे। उसके बाद भारत ने कहा था कि अफगानिस्तान में भारतीयों पर हमले पाकिस्तान की सेना और आईएसआई करवा रही है। अफगानिस्तान में चलाई जा रही विकासात्मक व अन्य रचनात्मक गतिविधियों के कारण भारत के वहां बढते असर को इसकी वजह बताया गया था।पाकिस्तान भारत के साथ युद्ध की स्थिति में अफगानिस्तान को सामरिक दृष्टि से सुरक्षित क्षेत्र मानता रहा है। अब पाकिस्तान को डर है कि वह खुद को पूर्वी सीमा पर भारत और पश्चिमी सीमा पर भारत समर्थक अफगानिस्तान सरकार से घिरा हुआ महसूस कर सकता है। पाकिस्तान को यह भी डर है कि अफगानिस्तान से सटे उसके पश्तून बहुल इलाके पर काबुल दावा जता सकता है, जिसे अफगानिस्तान दोनों देशों की विधिसम्मत सीमा नहीं मानता है।तालिबान के दावे को भारतीय एजेंसियां पाकिस्तान में बैठे साजिश रचने वालों की पहचान छिपाने की कोशिश मानते हैं। इस धारणा को बल इस बात से मिलता है कि दोनों हमलों का तरीका और चुना गया समय एक जैसे थे। कुछ प्रेक्षकों का मानना है कि हमले का मकसद अफगानिस्तान में अमरीका की रणनीति को प्रभावित करना भी हो सकता है। पाकिस्तान शायद यह संकेत देना चाहता है कि अमरीका यदि पाकिस्तान से सहयोग लेना चाहता है तो उसे भारत के अफगानिस्तान में बढते असर पर अंकुश लगाना होगा। भारत अफगानिस्तान में अपना शांतिपूर्ण असर बढाना चाहता है, जिससे तालिबान के भारत विरोधी मन्सूबों को नाकाम किया जा सके और इस क्षेत्र में इस्लामी कट्टरपंथियों के सम्भावित उभार को रोका जा सके, जो भारत के लिए सुरक्षा की गम्भीर समस्या बन सकता है। हमले का मकसद भारत को डराना और अमरीका को संकेत देना था। विदेश सचिव निरूपमा राव ने हाल ही कहा है कि हमले का निशाना निश्चित रू प से भारतीय दूतावास ही था। उन्होंने कहा कि 7 जुलाई 2008 को दूतावास भवन के बाहर हुए कार बम विस्फोट जैसा ही शक्तिशाली यह विस्फोट भी था। उनका कहना था कि भारत अफगानिस्तान में अपने हितों और अपने कर्मचारियों की हिफाजत के लिए हरसम्भव कदम उठाएगा। अमरीकी राजदूत ने बम विस्फोट को दुखद बताते हुए कहा कि राष्ट्रपति ओबामा भारत की जनता से अमरीका के भारत के प्रति समर्थन और इस बम विस्फोट पर गहरा दुख व्यक्त करते हैं।अफगान विदेश मंत्रालय ने कहा है कि 'यह हमला नियोजित था और इस पर अमल अफगानिस्तान की सीमाओं से बाहर से किया गया और इसे उसी आतंककारी गुट ने अन्जाम दिया, जिसने जुलाई 2008 में भारतीय दूतावास पर आत्मघाती हमला किया था।' दूसरे शब्दों में अफगानिस्तान ने पाकिस्तान की तरफ अंगुली उठाई है, हालांकि भारत ने सीधे पाक को दोषी नहीं ठहराया है। भारत और अफगानिस्तान दोनों ही 2008 में हुए हमले के लिए आईएसआई को जिम्मेदार मानते हैं। अफगानिस्तान में चल रही विकास परियोजनाओं पर कार्यरत भारतीय कर्मचारियों पर हुए हमलों के लिए भी दोनों देश आईएसआई को ही जिम्मेदार मानते हैं। अमरीकी अधिकारियों को संदेह है कि 2008 में दूतावास पर हुआ हमला अफगानी आतंककारी सरगना जलालुद्दीन हक्कानी के लोगों ने किया होगा, जिसके आतंककारी पाकिस्तान से सटे अफगानिस्तान के कबाइली इलाकों में अमरीकी सेनाओं से भिडते रहते हैं।इस्लामाबाद में पाक विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि अब्दुल वासित ने बम विस्फोट की निंदा करते हुए कहा है कि आतंककारी वारदातें जब भी हों, हमें इस खतरे को खत्म करने के लिए अपना संकल्प मजबूत करना चाहिए। काबुल में हुए इस विस्फोट में पाकिस्तान का हाथ होने के आरोप को वासित ने 'हास्यास्पद' बताया।काबुल में 17 सितम्बर के बाद यह दूसरा बडा बम विस्फोट था। सत्रह सितम्बर को आत्मघाती बम विस्फोट में इटली के 6 सैनिक और दस अफगान नागरिक मारे गए थे। अफगानिस्तान के आंतरिक मंत्रालय के अनुसार ताजा हमले में अफगानिस्तान के दो पुलिस अधिकारी व 15 नागरिक मारे गए और कम से कम 76 लोग घायल हुए हैं। राष्ट्रपति हामिद करजई, अमरीकी दूतावास और संयुक्त राष्ट्र मिशन तीनों ने हमले की कडी भत्र्सना की है। अफगान राजधानी पिछले कुछ दिनों में हुए आत्मघाती हमलों से दहल गई है। इनकी शुरूआत 20 अगस्त को हुए चुनावों के बाद हुई थी। हमलों के निशाने पर आम तौर पर अंतरराष्ट्रीय सेनाएं और सरकारी प्रतिष्ठान रहते हैं। अमरीकी दूतावास को भी हाल ही निशाना बनाया गया था।अफसर करीम[लेखक भारतीय सुरक्षा सलाहकार परिषद के सदस्य रहे हैं]

अमेरिका की मदद पर तकरार

केरी-लुगर सहायता विधेयक के सही-गलत होने को लेकर इन दिनों पाकिस्तान के सत्ता-प्रतिष्ठानों के बीच गरमा-गरम बहस चल निकली है। इस गरमा-गरमी की अपनी वाजिब वजह भी है। पाकिस्तान को सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र के लिए अमेरिका की ओर से जो सालाना 1.5 अरब डॉलर की मदद की पेशकश की गई है, उससे आर्थिक दृष्टि से तंगहाल किसी भी देश के मुंह में पानी आ सकता है, लेकिन दिक्कत इस विधेयक के साथ जुड़ी शर्तो को लेकर है। इन्हीं शर्तो की वजह से पाकिस्तान के शासन तंत्र में मतभेद उभर आए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पास इस विधेयक को हस्ताक्षर के लिए भेजने से पहले ही यह साफ हो चला था कि इससे राष्ट्रीय संवेदना को जरूर झटका लगेगा। इस विधेयक पर हस्ताक्षर होने अभी बाकी हैं, लेकिन विवाद है कि थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस विधेयक में यह प्रावधान है कि अमेरिका के विदेश मंत्री को अपने प्रशासन के समक्ष पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई और सेना की ओर से प्रमाण-पत्र पेश करना होगा। इसमें आईएसआई और सेना को यह प्रमाणित करना होगा कि वे तालिबान व अन्य आतंकी समूहों के प्रति कठोर और परमाणु अप्रसार को लेकर प्रतिबद्ध हैं।
यही नहीं, इन दोनों संस्थाओं से यह भी अपेक्षित होगा कि वे असैन्य सरकार के अधीनस्थ के तौर पर कार्य करें। इसलिए इस बात में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सेना ने विधेयक की शर्तो को लेकर सार्वजनिक रूप से चिंता जाहिर की है। सेना के कमांडरों की बैठक के बाद जारी एक बयान में कहा गया कि पाकिस्तान एक संप्रभु राष्ट्र है और इसलिए वह अपनी सुरक्षा को परिभाषित करने के लिए स्वतंत्र है। गौरतलब है कि पाक सेना द्वारा सार्वजनिक रूप से बयान जारी करने का यह दुर्लभ मौका था।
विधेयक की शर्तो पर असंतोष को लेकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को पहले से ही अंदाजा था। पार्टी ने सैन्य कमांडरों के बयान से एक रात पहले ही विधेयक का बचाव करने की कसमें खाई थीं। पार्टी ने साफतौर पर कहा था कि विधेयक की आलोचना उनके नेता जरदारी की स्थिति को कमजोर करने के मकसद से की जा रही है। लेकिन यह सार्वजनिक बयानबाजी भी सैन्य कमांडरों को बयान जारी करने से नहीं रोक पाई। अब साफ है कि इस मसले पर सेना और सत्ताधारी पार्टी आमने-सामने आ गई हैं।
सैन्य कमांडरों को बयान जारी करने के लिए उन आलोचनाओं से भी प्रेरणा मिली, जो विधेयक के आर्थिक प्रभावों को लेकर की जा रही हैं। विधेयक के पक्ष में एक दलील यह दी जा रही है कि इससे पाकिस्तान की आम जनता के जीवन स्तर को सुधारने में मदद मिलेगी, लेकिन कई लोग इससे बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं। जनरल परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में वित्तीय सलाहकार रहे डॉ. अशफाक अहमद खान का मानना है कि विधेयक से पाकिस्तान की जनता के आर्थिक विकास पर कोई सकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। इसके पक्ष में उनके अपने तर्क हैं।
अशफाक खान के मुताबिक अमेरिका ने 1.5 अरब डॉलर की जो वार्षिक सहायता देने का वादा किया है, उसमें से २क् करोड़ डॉलर उस अमेरिकी बुनियादी ढांचे पर ही खर्च किए जाएंगे जिसका मकसद सहायता कार्यक्रम पर नजर रखना है। अब इसमें से बचे 1.3 अरब डॉलर, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह पूरा पैसा पाकिस्तान सरकार को मिल पाएगा? मान लीजिए यह पूरी की पूरी रकम पाकिस्तान सरकार के माध्यम से खर्च की जाती है तो प्रति नागरिक प्रति वर्ष यह राशि बैठेगी महज आठ डॉलर। अशफाक पूछते हैं - क्या हम प्रत्येक नागरिक पर सालभर में महज आठ डॉलर खर्च करके उनके जीवन स्तर को ऊपर उठा सकते हैं?
इन विरोधाभासी विचारों के बीच सबसे बड़ा मसला यह है कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी सेना पर नियंत्रण रखने की खातिर अमेरिकी प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं। पाकिस्तान में इस विचार से इत्तेफाक रखने वालों की अच्छी-खासी तादाद है। लेकिन इस प्रक्रिया में जरदारी वाशिंगटन को पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों में दखल देने की जो राह मुहैया करवा रहे हैं, वह मुल्क के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकती है।
हाल ही में प्रकाशित कुछ रिपोर्ट्स इन आशंकाओं को बल प्रदान करती हैं, जिनमें कहा गया है कि अमेरिका अपने दूतावास के परिसर का विस्तार कर रहा है और उसने सैकड़ों मकान किराए पर उठाए हैं। संदेह है कि इनमें या तो अमेरिकी नौसैनिकों को रखा गया है या फिर ‘ब्लकवाटर’ के उन सिपाहियों को, जिन्हें अमेरिका दूसरे मुल्कों में गड़बड़ी करवाने के लिए अक्सर भाड़े पर लेता आया है। एक स्थानीय प्राइवेट फर्म इंटर-रिस्क अमेरिकी दूतावास की सुरक्षा में लगी हुई है। इसने अत्याधुनिक हथियारों का आयात किया है और साथ ही सेवानिवृत्त सैन्य कमांडरों की भी नियुक्ति की है। इसका उद्देश्य यही है कि अमेरिकी अधिकारियों और उनके कार्यालयों व आवासों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
राजधानी में शस्त्रों से लैस कुछ विदेशियों द्वारा स्थानीय पुलिस के साथ र्दुव्‍यवहार करने और फिर उनके अमेरिकी अधिकारियों द्वारा किराए पर लिए गए आवासों में छिप जाने की घटनाओं से भी पाकिस्तान सरकार की मुसीबतें बढ़ी हैं। इन सारी घटनाओं की वजह से पाकिस्तान में अमेरिका की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है। एक सर्वे बताता है कि केवल १३ फीसदी पाकिस्तानी ही बराक ओबामा की नीतियों का समर्थन करते हैं, जबकि शेष उनसे बिल्कुल निराश हैं। इसका मतलब यही है कि आर्थिक सहायता देकर पाकिस्तानियों का दिल और दिमाग जीतने की अमेरिकी नीति का मकसद केरी-लुगर विधेयक के लागू होने से पहले ही परास्त हो चुका है। विधेयक का दूसरा मकसद उन्माद और आपसी संघर्ष से ग्रस्त पाकिस्तान को स्थिरता प्रदान करना है, लेकिन वह भी दूर की कौड़ी ही नजर आता है।
पाकिस्तान की सेना द्वारा सार्वजनिक रूप से बयान जारी करना इस बात की ओर इशारा करता है कि मुल्क का राजनीतिक तंत्र लगभग ध्वस्त होने के कगार पर खड़ा है। हालांकि सत्ता पर सेना द्वारा कब्जा करने की आशंकाओं को तो अतिशयोक्तिपूर्ण ठहराकर खारिज किया जा सकता है, लेकिन यह तो साफ है कि सेना और सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बीच मतभेदों की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि उसे पाटना अब लगभग नामुमकिन नजर आता है। इससे पाकिस्तान मुस्लिम लीग के दोनों धड़ों सहित विपक्षी पार्टियों ने मध्यावधि चुनावों के लिए कमर कसनी शुरू कर दी है।
यह सारा घटनाक्रम उन वैश्विक ताकतों के लिए अच्छी खबर नहीं है जो अफगानिस्तान में तालिबान से संघर्ष पर ध्यान केंद्रित करना चाहती हैं। इस लड़ाई में पाकिस्तान एक अहम पक्ष है, लेकिन अभी तो वह अपनी ही अंदरूनी परेशानियों से दो-दो हाथ करता नजर आ रहा है।
-लेखक पाकिस्तान स्थित आज टीवी के कार्यकारी निदेशक हैं

Sunday, October 11, 2009

ऑपरेशन से पहले :नक्सलवाद

सरकार की एकमुश्त कार्रवाई के पहले धमकाने और समझौता वार्ता की कोई सूरत निकालने के लिए नक्सलियों ने अपनी छापामार लड़ाई तेज कर दी है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में 17 पुलिस वालों को मारना उनकी इसी रणनीति का हिस्सा है। इसी रणनीति के तहत वे सहानुभूति रखने वाले राजनीतिक दलों और नेताओं से भी ऑपरेशन रोकने के लिए दबाव बनवा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी और लालू प्रसाद के बयान इसी कड़ी में देखे जा सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस पुरुलिया जिले में लालगढ़ की लड़ाई को गरीब और अमीर के बीच का संघर्ष बता रही हैं। दूसरी तरफ लालू प्रसाद ने नक्सलियों के हिंसक दमन का विरोध करते हुए महंगाई के खिलाफ लड़ाई की अपील की है। नक्सलियों पर कार्रवाई को लेकर जहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी दृढ़ है, वहीं वाम मोर्चा के अन्य घटक और खुद बुद्धदेव ढुलमुल बातें कर रहे हैं। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की इसी दुविधा का लाभ उठाते हुए नक्सली एक तरफ बर्बरता कर रहे हैं तो दूसरी तरफ सामाजिक न्याय और विकास के लिए सरकार से वार्ता का प्रस्ताव भी दे रहे हैं। युद्ध और शांति की इस पैंतरेबाजी में उनकी बर्बरता ही उनके खिलाफ सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बनने जा रही है। उन्होंने झारखंड के जिस पुलिस अधिकारी का सिर कलम किया है, वह छह महीने से बिना वेतन के काम कर रहा था। इसी तरह गढ़चिरौली में मारे गए पुलिस वाले कोई बुजुरआ तो कहे नहीं जा सकते। सरकार ने इसी लिहाज से नक्सलियों से लड़ने की रणनीति भी बनाई है। सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी ने जो फैसला लिया है, उसमें एक तरफ हथियार बंद छापामार समूहों पर अतिआधुनिक हथियारों से लैस हो कर कार्रवाई शामिल है तो दूसरी तरफ समाज के वंचित तबके के लिए संपत्ति के समतावादी वितरण की योजना भी है। जाहिर है यह जटिल काम है। इसीलिए मीडिया और कुछ नेता भले नक्सल विरोधी कार्रवाई को युद्ध की संज्ञा दे रहे हों, लेकिन सरकार खुले आम ऐसा नहीं कह रही है। न ही वह वायुसेना और सेना के प्रयोग का उल्लेख करने को लेकर उत्साहित है। स्पष्ट है दीवाली और विधानसभा चुनावों के बाद का दौर जमीनी स्तर पर काफी मारधाड़ और खून-खराबे का होने जा रहा है। उम्मीद कम है फिर भी इस बीच नक्सलियों को हथियार डाल कर वार्ता करने की सद्बुद्धि आ जाए तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।

veetuark: ओबामा नही तो और कौन

बराक ओबामा को नोबेल पुरस्कार देने से एक गंभीर खतरा यह पैदा हो गया है कि वे इसे गंभीरता से ले सकते हैं। शुरुआती संकेत यही है कि वे ऐसा ही करेंगे। पुरस्कार की घोषणा के बाद उन्होंने कहा, ‘मैं इसे इस रूप में स्वीकार करता हूं कि मुझे अब काम करना होगा।’ इसका मतलब यही है कि उन्होंने कम से कम यह स्वीकार कर लिया है कि अब तक उन्होंने कुछ नहीं किया। सवाल यह है कि आखिर नोबेल समिति ने पिछले छह महीने में ऐसा क्या देख लिया? क्या महमूद अब्बास, नेतान्याहू और ओबामा ने फलस्तीन राष्ट्र का निर्माण कर दिया? क्या हिजबुल्लाह तेहरान में वार्ता करने को चला गया? क्या भारत और पाकिस्तान ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए किसी समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए और ओबामा पृष्ठभूमि में मंडराते रहे?ओबामा ने अफगानिस्तान की लड़ाई में और 50 हजार सैनिक झोंक दिए, ताकि पेंटागन के सैन्य अफसर अगले एक दशक तक चट्टानी मैदानों में युद्ध लड़ते रहें। अफगानिस्तान में अमेरिकी उपस्थिति को न्यायसंगत ठहराने को लेकर भले ही ओबामा के अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन ओस्लो में बैठे भलेमानुसों को कम से कम इस लड़ाई की समाप्ति का तो इंतजार कर लेना चाहिए था। नोबेल समिति का आधिकारिक तर्क है कि ओबामा उम्मीद के प्रतीक हैं। यह तो अच्छी बात है। इससे भविष्य में पुरस्कार जीतने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। अब बस उम्मीद करनी है, और शायद प्रार्थना भी, कि लश्कर-ए-तैयबा गांधीवाद की राह पर चलने लगे। इससे हो सकता है कि अक्टूबर २क्१क् में आपके लेटरबॉक्स में भी ओस्लो से एक शानदार खत आ जाए।क्या परमाणु अप्रसार पुरस्कार जीतने की वजह है? यदि ऐसा ही है तो फिर ओबामा से भी ज्यादा काम तो कर्नल एम गद्दाफी ने किया है। उन्होंने अपने देश में परमाणु हथियार संयत्र को ही खत्म कर दिया। उन्होंने भले ही यह दबाव में किया, लेकिन कुछ किया तो सही। ओबामा ने क्या किया? बस कुछ शानदार भाषण दे दिए। ओबामा ने परमाणु हथियारों से लैस दुनिया के सबसे सम्पन्न उस देश को वश में करने के लिए कुछ नहीं किया, जो स्वयं को अंतरराष्ट्रीय नियंत्रणों व संधियों से सदैव ऊपर ही समझता आया है। यह देश उनका अमेरिका ही है। ओबामा का जोर परमाणु अप्रसार पर ही रहेगा। हालांकि वे अमेरिका की परमाणु ताकत को लेकर कुछ नहीं करेंगे। वे ‘बिग फाइव’ को लेकर भी कुछ नहीं कर सकते। उनके पास यही विकल्प होगा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नेस्तनाबूद किया जाए और भारत को जितना संभव हो सके, धमकाया जाए। यदि बुश इराक के लिए खतरनाक थे तो ओबामा भारत के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।यह हो सकता है कि नोबेल समिति के सामने ऐसे लोगों का अभाव हो, जिन्हें कि पुरस्कार दिया जा सके, लेकिन इस पुरस्कार का दायरा सुधारवादी योद्धाओं से भी परे मानवीयता तक बढ़ाया जा चुका है। हमारे पास योग्य व्यक्तियों या संस्थानों की कमी नहीं हैं। ऐसे कई डॉक्टर हैं, जिन्होंने युद्धरत इलाकों में निस्वार्थ भाव से काम किया है। वोहुमुद alऐसे डॉक्टर पैसा और इनाम दोनों पाने के हकदार हैं। आगा खान भी ऐसे ही नाम हैं, जिन्हें भले ही पैसों की दरकार न हो, लेकिन उनके फाउंडेशन ने मानव सभ्यता के कई महान स्मारकों के संरक्षण का जो कार्य किया है, उससे वे सम्मान पाने के हकदार तो बनते ही हैं।ओबामा को नोबेल पुरस्कार देने का एक बहुत बड़ा कारण मौजूद है। हालांकि वह उनके प्रशस्ति पत्र में नहीं लिखा गया है। ओबामा ने अमेरिका के हालिया इतिहास के सबसे बड़े युद्ध उन्मादियों रिपब्लिकनों को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया है। विश्व शांति में इसे एक योगदान माना जा सकता है।

ओबामा नही तो और कौन

बहस वास्तव में इस बात पर होनी चाहिए कि वर्ष 2009 के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार अगर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को नहीं मिलना था तो और किसे दिया जा सकता था। नोबेल शांति पुरस्कार के लिए योग्य व्यक्ति की खोज रसायन या भौतिकशास्त्र के लिए बंद प्रयोगशालाओं में प्राप्त की जाने वाली उपलब्धियों से हमेशा ही अलग रहेगी। प्रयोगशालाओं में खपाए जाने वाले नौ या नब्बे सालों और दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के राष्ट्रपति पद पर बिताए गए सिर्फ नौ-दस महीनों के कार्यकाल के बीच आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन न तो तर्कसंगत है और न ही न्यायसंगत। चिंता इस बात पर व्यक्त की जा सकती है कि अगर बराक ओबामा को इतना बड़ा पुरस्कार देने में हड़बड़ी दिखाई गई है तो वजह शायद यह भी रही हो कि इतनी बड़ी दुनिया में कोई दूसरा योग्य व्यक्ति नार्वे की नोबेल पुरस्कार समिति को नजर आया ही नहीं हो। अगर हालात वास्तव में ऐसे ही हैं तो वर्ष 2010 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए कोई दूसरा योग्य व्यक्ति मिल ही नहीं पाए। और बराक ओबामा पर ही फिर से नजरें टिक जाएं। महात्मा गांधी को कभी भी नोबेल शांति पुरस्कार के काबिल नहीं समझा गया। उनके नाम का तीन बार प्रस्ताव हुआ और तीनों बार उन्हें पुरस्कार के योग्य नहीं पाया गया। अपने ही देश भारत में ऐसा कई बार और कई लोगों के साथ हो चुका है और आगे नहीं होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। जयप्रकाश नारायण को सरकारों ने न तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माना और न ही कभी किसी पद्म पुरस्कार के काबिल समझा। बराक ओबामा को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर शोक के बजाए जश्न मनाना चाहिए। वह इसलिए कि ओबामा के हाथों में पुरस्कार थमाकर इस बात की व्यवस्था कर दी गई है कि आने वाले सालों में दुनिया में शांति की स्थापना करने का काम इस अश्वेत राष्ट्रपति को ही करना है। नोबेल समिति द्वारा पुरस्कार उन हस्तियों को ही दिए जाने की परम्परा रही है जो कि दुनिया को बदलने की दिशा में पहले से कोई उल्लेखनीय कार्य करके दिखा चुके हैं। बराक ओबामा का चयन इसलिए महत्वपूर्ण है कि पुरस्कार को सार्थक बनाने की जिम्मेदारी अब अमेरिकी राष्ट्रपति पर है, नार्वे की नोबेल पुरस्कार समिति पर नहीं।बराक ओबामा को पुरस्कार ऐसे वक्त दिया गया है, जिसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति भी शायद तैयार नहीं थे। दुनियाभर में अपनी खुफियागिरी का जाल बिछाने के लिए कुख्यात अमेरिकी जासूसों को भी भनक नहीं पड़ पाई कि ओस्लो में कोई ऐसा फैसला लिया जा रहा है, जो आने वाले वर्षो के लिए अमेरिकी नीतियों को प्रभावित करने वाला साबित होगा। राष्ट्रपति ओबामा भी तब नींद ले रहे थे। अमेरिका को कोई भी सदमा नींद में ही दिया जा सकता है, जागते-बूझते नहीं। ओबामा ने अगर अपनी प्रतिक्रिया में यह कहा है कि वे अपने को इतने बड़े पुरस्कार के काबिल नहीं मानते तो इसके पीछे अमेरिका जैसे राष्ट्र के प्रमुख के रूप में उनकी मजबूरियों को समझा जा सकता है। मुद्दा यह नहीं है कि बराक ओबामा को राष्ट्रपति के रूप में केवल नौ-दस महीने का ही अनुभव है और कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति अथवा परमाणु नि:शस्त्रीकरण की दिशा में अभी कोई महान योगदान नहीं दिया है, जैसा कि उनकी प्रशस्ति में गिनाया गया है। बराक ओबामा को अब यह सब करके दिखाना होगा। वे अगर अपने पहले कार्यकाल में ऐसा नहीं कर पाते हैं तो न सिर्फ दूसरे कार्यकाल के योग्य नहीं रहेंगे, उनके साथ दुनिया भर के अश्वेतों की जो आकांक्षाएं जुड़ी हैं उनका भी अंत हो जाएगा। बुश जिस तरह का व्हाइट हाउस बराक ओबामा के लिए छोड़कर गए हैं, वह केवल आतंकवाद और परमाणु अस्त्रों से भरा हुआ है। ओबामा के समक्ष चुनौती केवल यह नहीं है कि वे दुनिया में शांति कैसे कायम करेंगे, बल्कि यह भी है कि वे अमेरिका को भी कैसे आतंक के साये से आजाद कर पाते हैं। ओबामा को शांति पुरस्कार एक ऐसे वक्त दिया गया है, जब अफगानिस्तान में तैनात नाटो फौजों के अमेरिकी कमाण्डर मेकक्रिस्टल ने अमेरिकी राष्ट्रपति से मांग कर रखी है कि उन्हें और सैनिकों की जरूरत है, अन्यथा पूरा मिशन फेल हो जाएगा। नाटो गठबंधन में शामिल देश अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाना चाहते हैं। अमेरिकी सैनिक इराक से वापस स्वदेश लौटने और अपने परिवारों के साथ क्रिसमस मनाने के ख्वाब देख रहे हैं। अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजें 9/11 के बाद भेजी गई थीं। तब घोषित उद्देश्य यही था कि अमेरिका पर आतंकवादी हमले के दोषी तत्वों को खत्म कर फौजें वापस लौट आएंगी। पर ऐसा हुआ नहीं। आठ सालों के बाद भी हालात लगभग वैसे ही हैं। आतंकवाद अब पाकिस्तान में नए सिरे से पैर पसार रहा है और कीमत बराक ओबामा से वसूल करना चाहता है। अत: इस बात का केवल अंदाज ही लगाया जा सकता है कि अगर ओबामा को जरा सी भनक भी पड़ जाती तो पूरा अमेरिकी प्रशासन शायद इस प्रयास में जुट जाता कि नोबेल पुरस्कार उन्हें प्राप्त न हो। समूचे अमेरिका के साथ-साथ विश्व जानता है कि ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त होने के अर्थ क्या हैं। पर ओबामा अगर पुरस्कार को सार्थक करने में सफल हो गए तो दुनिया का नक्शा बदल भी सकता है। अश्वेत राष्ट्रपति ऐसा करके दिखा भी सकते हैं। नोबेल पुरस्कार समिति को अपने फैसले पर पश्चाताप करने का मौका न भी मिले।

Monday, October 5, 2009

बोफोर्स केस

मामले पर सुनवाई के दौरान सालिसिटर जनरल ने उच्चतम न्यायालय को सूचित किया है कि सरकार ने इटली के व्यापारी ओट्टावियो क्वात्रोच्चि के खिलाफ दायर सभी मामले वापस लेने का फैसला किया है। क्वात्रोच्चि बोफोर्स मामले में एकमात्र जीवित अभियुक्त है। न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ को यह सूचना देने के बाद तीन अक्टूबर को मामले की सुनवाई के दौरान तीस हजारी अदालत में अर्जी देकर कहा गया कि क्वात्रोच्चि के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला, इसलिए इस मामले को वापस लेने का फैसला किया गया है। इस तरह साढे तेईस साल तक बोफोर्स घोटाले या महाघोटाले के नाम से विख्यात रहे इस मामले को बेढंगे तरीके से दफनाया जा रहा है। बोफोर्स मुद्दे के कारण 1989 के आम चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को जबर्दस्त शिकस्त झेलनी पडी थी, जो पांच साल पहले अपूर्व बहुमत के साथ सत्ता में आए थे। स्वीडन की कम्पनी बोफोर्स से भारत सरकार के दस अरब रूपए से ज्यादा के सौदे के एक साल बाद अप्रेल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने एक समाचार प्रसारित किया था। इसमें कहा गया था कि बोफोर्स कम्पनी ने तोप बेचने के इस सौदे के लिए करोडों रूपए की घूस दी थी। बोफोर्स कम्पनी का भारत में प्रतिनिधि विन चbा, लंदन निवासी तीन हिंदुजा भाई, तत्कालीन रक्षा सचिव एस.के. भटनागर और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का नाम भी इस घोटाले में उछला। इटली की रासायनिक खाद कम्पनी स्नेमप्रोगेती के भारत में प्रतिनिधि क्वात्रोच्चि का नाम इस घोटाले में लिया गया तो भारत में उद्योग और वाणिज्य क्षेत्र के जानकारों को कतई आश्चर्य नहीं हुआ। सक्रिय दलाल और विभिन्न सरकारी विभागों व मंत्रालयों में आसानी से पैठ के कारण लोग उसे जानते थे। लोकसभा में कांग्रेस को मिले प्रचण्ड बहुमत के कारण इस मामले में टालमटोल की जाती रही। अगस्त 1987 में बोफोर्स सौदे की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति बनाई गई, जिसमें कांग्रेसियों का बहुमत था। धीरे-धीरे इत्मीनान से जांच कर एक साल में संसदीय समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची कि इस सौदे में कोई गडबडी नहीं हुई और सौदे की प्रक्रिया ईमानदारी के साथ पूरी की गई। जनवरी 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में नई सरकार बनने पर अर्थात सौदा होने के पौने पांच साल बाद बोफोर्स सौदे को लेकर भ्रष्टाचार, बेईमानी और आपराधिक साजिश का मामला दर्ज किया गया।इतने लम्बे समय तक मामला दर्ज नहीं होने के कारण शुरू में जांच-पडताल में बहुत दिक्कत हुई। दलाली का पैसा किसी ज्यादा सुरक्षित जगह पर ले जाने का मौका संबद्ध लोगों को मिल गया। बैंक खाते विभिन्न देशों में डमी कम्पनियों के नाम से थे। स्विट्जरलैंड के कानून और बैंकों की खातेदारों के बारे में गोपनीयता रखने की नीति से जांच कार्य में गंभीर बाधा पैदा हुई, जिससे दलाली के पैसे का पीछा पूरी तरह नहीं हो पाया। हिंदुजा बंधुओं ने स्विट्जरलैंड की विभिन्न अदालतों में कई याचिकाएं दायर कर अडंगे डाले। सरकारों में जल्दी-जल्दी बदलाव और कांग्रेस के समर्थन पर टिकी साझा सरकारों के कारण जांच के काम में ब्ा्रेक लगते रहे। समय बीतने के साथ सजा दिलाने के लिए जरू री सबूत मिलने की संभावनाएं क्षीण होती गईं। इसी दौरान 21 मई 1991 को राजीव गांधी की एक चुनावी सभा में आत्मघाती बम विस्फोट कर हत्या कर दी गई। विन चbा और एस.के. भटनागर की मृत्यु 2001 में हो गई। नरसिंहराव के प्रधानमंत्री काल (1991-96) में जांच के काम में कोई खास प्रगति नहीं हुई। आखिर सीबीआई ने बोफोर्स सौदे को तेरह साल से ज्यादा बीतने के बाद अक्टूबर 1999 में अदालत में आरोप पत्र दायर किया। इसमें विन चbा, एस.के. भटनागर, मार्टिन आर्डब्ा्रो, क्वात्रोच्चि और बोफोर्स कम्पनी को अभियुक्त बनाया गया। आरोप पत्र में राजीव गांधी का उल्लेख ऎसे अभियुक्त के रू प में था, जिसे 'सुनवाई के लिए मामले में शामिल नहीं' किया गया था। यह ओछी, तिरस्कारपूर्ण और तुच्छ चेष्टा साबित हुई क्योंकि इस मामले में राजीव गांधी के शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिला था। इसलिए वर्ष 2004 के शुरू में दिल्ली उच्च न्यायालय ने बेहिचक राजीव गांधी को क्लीनचिट दे दी थी। अनुमान और निष्कर्ष कितने ही तर्कसंगत हों, उन्हें सबूत नहीं माना जा सकता। सीबीआई की ओर से अदालत में दायर दूसरे आरोप-पत्र में तीन हिंदुजा बंधुओं को भी अभियुक्त बनाया गया था। उन्हें भी दिल्ली उच्च न्यायालय ने बाइज्जत बरी कर दिया था।क्वात्रोच्चि ही बोफोर्स मामले में एकमात्र अभियुक्त रह गया था। उसे सुनवाई के लिए भारत लाने की मलेशिया और अर्जेंटीना में की गई दो कोशिशें सिरे नहीं चढ पाईं। अर्जेंटीना में तो भारत की किसी अदालत के गिरफ्तारी वारंट भी पेश नहीं किए गए, जो महत्वपूर्ण थे। क्वात्रोच्चि के लंदन में स्थित बैंक खातों से लेन-देन पर लगी रोक जिस तरह हटाई गई और बाद में जिस तरह उसके खिलाफ जारी रेड कार्नर नोटिस वापस लिया गया, वह बोफोर्स के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। घूस के साधारण मामलों में भी यदि अभियुक्त रंगे हाथों नहीं पकडा जाए तो उसे दोषी साबित करना टेढी खीर होता है। इसके लिए रिश्वत देने वाले का पूरा सहयोग मिलना जरू री होता है। ऊंचे स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार के मामलों में तो सबूत मिल पाना और मुश्किल हो जाता है क्योंकि उसमें ली गई मोटी रकम विदेशों में स्थित ऎसे बैंकों में जमा करा दी जाती है जो गोपनीयता के लिए मशहूर हैं। बोफोर्स मामले से आम लोगों की इस धारणा को भी बल मिला है कि पैसे और पहुंच वालों की बात ही कुछ और होती है, वे आम आदमी की तरह कानून की गिरफ्त में नहीं आ सकते। सीबीआई ने बोफोर्स मामले में घूस की रकम 64 करोड रूपए बताई थी। आजकल के चर्चित घोटालों के हिसाब से देखें तो यह रकम नगण्य-सी है। दूसरी ओर इसकी बरसों चली लम्बी जांच पर लगभग ढाई अरब रूपए खर्च हो गए और सजा एक भी अभियुक्त को नहीं मिल पाई।अरूण भगत[लेखक गुप्तचर ब्यूरो के निदेशक रहे हैं

Panni ke liye kub tak lahu bahayege hum hindustani ?

Rajasthan me sarkaar teen roja pani kee baat kar rahi hai jbki janta saat roja pani mang rahi hai. 2004 me hue gharsana aandolan me ek police station jala diya gaya tha or teen logo ke maut ho gai the . vo bhe octobur tha. 2 october ko mahatama gandhi ka janam deen hota hai .roos me kranti bhi octobar me hui the .lekin ye russia nahi bharar hai yaha october shanti ka parichayak hai. Es bar ye samsaya rajneeti me na uljhe .us vakt rajasthan me BJP ke sarkar the jub 3 lof mare gaye the is bar kamredo ke saath saath BJP ko bhi naram rukhk apnana chahiye .is bare me punjab se shanti purvak baat kar shanti se niptara ho tabhi behatur hai .junta ko bhi sarkar ki majbureeyo ko sunna chahiye .
Udhar Maharastra . andra . tamilnadu me baad se sankando log mare gaye .sarkar ko aapda praband ki sahi neeti bannai chahiye tatha mausam vibhag taknik me bhi sudhar hona chahiye . Hame pani ki ek ek boond ko sahej kar rakhana hoga or uski baad ko bhi rokna hoga .sarkar bhumi urgen act per bhi vichar kar rahi hai .jadi jodo jaise karyo hate land ka urjen sarkar ko apne haath me rakhana hoga . vajpai dwara sujhai nadi jodo prariyojna pur budge me vyvasha karn bahut jaroori ho gaya hai . agar gharsana me pani ki vajah se to sarkari laprvahi se kuchh log mare the .vaha south me to kitne log mur gaye sarkar ke indirect negligense ki vajah se.

Saath hi hame global warming . ozon protection ke bare me bhi sochana chaiye . sarkar se to ye ozon ki parat behatar hai jo 90 persent ultravoilet rays ko darti pur aane se rokti hai .varna or jayada globul warming badegi.

Friday, October 2, 2009

khooswant singh एंड सिख दंगे एंड विदेशों से आया पैसा

भारत के हर राज्य के लोगों को दुनिया के लगभग हर देश में पाया जा सकता है। सबसे ज्यादा नजर आते हैं - सिंधी, सिख, गुजराती और केरल के लोग। इन चारों राज्यों के विदेशों में रह रहे लोग कम से कम एक पीढ़ी तक अपनी मातृभूमि के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश करते हैं और अगर वे अच्छा-खासा कमा रहे हैं तो अपनी बचत का एक हिस्सा अपने भाई-बहनों के जीवन स्तर को उन्नत करने के लिए घर भेजते हैं। कुछ उदाहरण दिमाग में आते हैं : हिंदुजा (सिंधी) ने मुंबई में विशालकाय अस्पताल का निर्माण करवाया है।
सर गुलाम नून (गुजराती) ने राजस्थान में, जहां उन्होंने कुछ वर्ष गुजारे थे, तमाम आधुनिक सुविधाओं से सज्जित अस्पताल बनवाया है। वर्तमान में पंजाब में मुश्किल से ही कोई ऐसा गांव होगा, जहां ऐसा गुरुद्वारा, अस्पताल, स्कूल या कॉलेज न हो, जो विदेश में रहने वाले गांव के किसी व्यक्ति ने बनवाया हो। अभी हाल ही में प्रकाशित किताब सिख डायसपोरा फिलैन्थ्रॉफी इन पंजाब : फिलैन्थ्रॉफी गिविंग फॉर लोकल गुड, जिसका संपादन वेनी एस डच्यूसेनबेरी और दर्शन एस टाटला ने किया है, में अपना देश छोड़कर पूरी दुनिया में और विशेष रूप से इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका में बसे हुए सिख समुदाय के पूरे इतिहास का सर्वेक्षण है।
यह किताब उनके योगदान के बारे में बताती है और यह कि वह कौन सी बात है, जिसने उन्हें अपनी आय का एक हिस्सा इन कामों में लगाने के लिए प्रेरित किया। उन शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि विदेश में रहने वाले सभी समुदाय के लोग भारत में कट्टरपंथी हिंदू संगठनों को पैसे देते हैं। लगभग एक दशक तक सिख अलगाववादी संगठनों और खालिस्तानी आतंकवादियों को विदेश में बसे हुए उनके सिख अनुगामियों से अच्छा-खास पैसा मिलता रहा। सौभाग्य से उन्हें समय रहते अपनी गलती का एहसास हो गया, पैसे आने बंद हो गए और खालिस्तान की मांग भी बंद हो गई। आज उनमें से सिर्फ एकाध नाम ही बचे रह गए हैं जो समय-समय पर मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए भड़काऊ बयान देते रहते हैं। कोई भी उनकी बात पर रत्ती भर ध्यान नहीं देता है।अपनी आय का दसवां हिस्सा दान करने की परंपरा उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना सिख धर्म है। गुरुनानक ने अपने अनुयायियों को उपदेश दिया था:अक्ली साहिबु सेवीए, अक्ली पाई मानु।अक्ली पढ़ के बूझत, अक्ली कीजे दान।।अर्थात भगवान की सेवा करने के लिए अपनी अकल का इस्तेमाल करो और आदर पाओ। पढ़ने-समझने और दान करने के लिए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करो।घाल खाल की टुट्टन देनानक राह पचन्ने से।अर्थात अपनी कोशिशों और मेहनत से कमाए हुए धन का एक हिस्सा दान करो। नानक कहते हैं कि ऐसे व्यक्तियों को ही सच्च मार्ग मिलता है।एक के बाद एक सभी गुरुओं ने अपनी आय का एक हिस्सा जरूरतमंदों को देने की प्रशंसा की है, जब तक कि यह एक आदर्श लक्ष्य न बन जाए:किरत करो, नाम जपो, वंड छको।काम करो, भगवान का नाम लो और अपनी कमाई दूसरों के साथ बांटो।इस भेजे हुए धन को जिस तरह से खर्च किया जाता है, उसका एक नियत तरीका बन गया है। नए गुरुद्वारे बनवाना सबसे पहली वरीयता होती है। स्कूल और अस्पताल दूसरे और तीसरे नंबर पर आते हैं।............................................जूता फेंकने वाले की कहानी : जरनैल सिंह याद हैं? यह वही व्यक्ति है, जिसने गृह मंत्री पीसी चिदंबरम पर जूता फेंका था। उसने गलत शिकार चुना क्योंकि चिदंबरम ने उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था और न ही चिदंबरम का उस बात से कोई लेना-देना था, जो बात जरनैल सिंह को गुस्सा दिला रही थी। जो भी हो, उसने उसे निशाना बनाया, जो उसके दिमाग में था। ये तो कांग्रेस पार्टी के नेतागण थे, जिन्होंने आगामी लोकसभा चुनावों में दो सीटों पर जगदीश टाइटलर और सज्जन सिंह को टिकट दिया था।अपने जीवन में की गई उनकी अक्षम्य हरकतों के कारण कांग्रेस आलाकमान को अंतत: उनके नाम वापस लेने पड़े। जरनैल सिंह फिर से खबरों में आने वाले हैं। पेंगुइन (इंडिया) ने जरनैल सिंह के साथ अपनी कहानी सुनाने और यह बताने के लिए कि उन्होंने जो किया, वह क्यों किया, एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं। उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं है। इसलिए उन्होंने यह हिंदी में लिखा है। उसका अंग्रेजी अनुवाद ‘आई एक्यूज’ शीघ्र ही प्रकाशित होगा। ‘आई एक्यूज’ सिख दंगों से जुड़े उन सभी लोगों के खिलाफ गंभीर आरोप है, जो उस समय अपना दायित्व निभाने में असफल रहे, जब 31 अक्टूबर 1984 को अपने दो सिख अंगरक्षकों द्वारा इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दंगाइयों की भीड़ ने 5000 से ज्यादा मासूम सिखों को मार डाला, उनके घर और संपत्ति तहस-नहस कर दी और उन्हें लूटा। अपनी ताकत का इस्तेमाल करने की कायरतापूर्ण अक्षमता और राष्ट्रपति भवन की सुरक्षागाह से बाहर निकलने की उनकी अनिच्छा के लिए राष्ट्रपति जैल सिंह का नाम विशेष रूप से आता है। दिल्ली प्रशासन और खासतौर से दिल्ली पुलिस दंगाई भीड़ के साथ थी। राजीव गांधी यह कहकर कि ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है’ अप्रत्यक्ष रूप से इस अपराध के भागीदार थे और एचकेएल भगत और जगदीश टाइटलर जैसे लोग हिंसा को भड़काने के लिए जिम्मेदार थे। जरनैल सिंह का परिवार इस हत्याकांड का शिकार हुआ था। वे लोग पाकिस्तान से आए शरणार्थी थे, जिन्हें लाजपत नगर में एक जगह शरण मिल गई थी। उनके पिता बढ़ई थे, जो अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए पर्याप्त धन कमा लेते थे। जरनैल सिंह हिंदू लड़कों के साथ क्रिकेट खेला करते थे। अचानक 31 अक्टूबर को एक तूफान उठा और उनके पड़ोसी उनके खिलाफ हो गए। युवक ऊंचाई पर छिप गए, लेकिन बहुत से मित्रों और रिश्तेदारों को मार डाला गया और बहुतों को जिंदा जला दिया गया। यह दहला देने वाली कहानी है, जो एक ऐसे आदमी ने लिखी है, जिसने अपनी आंखों के सामने यह सब होते देखा। यह विश्वसनीय है क्योंकि यह एक चोट खाए दिल से निकली है।

चीन का दिखावा

चीन की ओर से भारत को उकसाने या चिढ़ाने वाली कार्रवाइयों का अब एक लंबा सिलसिला हो गया है। विश्व बाजारों में मेड-इन-इंडिया की नकली छाप वाले दोयम दर्जे के सामानों की सप्लाई से लेकर इंटरनेट पर भारत के टुकड़े-टुकड़े कर देने की कथित विशेषज्ञ की खोखली सलाह तक और अरुणाचल प्रदेश में नई परियोजनाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता में अडंगे लगाने से लेकर सीमाओं के हवाई उल्लंघन व जमीनी अतिक्रमण तक इन घटनाओं में एक पैटर्न देखा जा सकता है।
कश्मीर में रहने वाले भारतीय नागरिकों को अलग ढंग का वीजा जारी करना भी इसी सिलसिले की कड़ी है। यह इस अर्थ में ज्यादा गंभीर है कि भारत के जिस अभिन्न हिस्से पर विवाद से चीन का कोई लेना-देना नहीं है, उसे विवादग्रस्त और अमान्य बताने का यह नया तरीका उसने खोजा है।
यह मानने के एकाधिक कारण हैं कि इस मोड़ पर भारत के साथ सैन्य टकराव चीन की मंशा नहीं हो सकती। एक और युद्ध से वह अपनी वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को डांवाडोल होने देने का जोखिम नहीं लेना चाहेगा। यूरोपीय बाजारों में मंदी से हुए नुकसान की भरपाई के लिए उसे भारतीय बाजार की जरूरत है। ऐसे में इन कार्रवाइयों का मकसद भारत का ध्यान भटकाना और बतंगड़ पैदा करना ही हो सकता है।
ठीक इसी वजह से भारत को इन घटनाओं से अनावश्यक रूप से विचलित दिखाई नहीं देना चाहिए। विचलित और परेशान दिखाई देकर हम आखिर उसी चीनी मकसद को पूरा कर रहे होंगे जो इन घटनाओं के पीछे हो सकता है। न ही हमें अपनी आर्थिक प्रगति और वैश्विक शक्ति बनने के लक्ष्य से ध्यान भटकने देना चाहिए। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि इन घटनाओं को अनदेखा कर दिया जाए। जहां और जितना जरूरी हो, हमें अपना विरोध दर्ज करवाते हुए इन्हें बेअसर करने के उपाय करने चाहिए, जैसा कि कश्मीरी भारतीयों को दिए गए अलग तरीके के वीजा को नामंजूर करके हमारी सरकार ने किया है।
इससे ज्यादा जरूरी और अहम यह है कि चीन के इस खुराफाती व्यवहार को समझकर उसके अनुरूप एक मुकम्मल नीति बनाई जाए। अभी तक इन घटनाओं पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया प्राय: तदर्थ और कई बार अंतर्विरोधी रही है। समान वैश्विक महत्वाकांक्षा के साथ आगे बढ़ रहे दो दिग्गज पड़ोसी देशों में भावी तीव्र प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए हमें अपनी नीति व्यवहार तय करना होगा।

लाल बहादुर जन्म विशेष

अभी हाल ही में शशि थरूर के ‘कैटल क्लास’ वाले साधारण बयान और सुविधाजनक जीवन जीने के लिए अपना पैसा अपने ऊपर खर्च करने पर जिस तरह अतिरंजित किस्म की प्रतिक्रियाएं हुई हैं, मैं उससे गंभीर रूप से परेशान हूं। इस दौरान सादगी का दिखावा, मितव्ययता बरतने के लिए जननेताओं के बयान, शताब्दी एक्सप्रेस की यात्रा, बिजनेस क्लास की सुविधाओं को बंद करना और नैतिकता का ऊंचा धरातल इत्यादि देखने को मिला, जिसे इस देश की पुरानी पीढ़ी थोड़ा-सा भी प्रेरित किए जाने पर अपनाना चाहती है। इसमें तीन मुख्य बातें मुझे चौंकाती हैं।

पहली, हममें से बहुत से लोग अभी भी इस बात को लेकर दुविधा में हैं कि वास्तव में एक राजनीतिज्ञ से क्या अपेक्षा करनी चाहिए। दूसरी, वास्तविक सादगी के पैमाने पर कोई बहस ही नहीं होती, जिससे वास्तव में सरकार की कर्ज के बोझ से दबी हुई अर्थव्यवस्था में कोई बदलाव आएगा। और तीसरी, भारतीयों में हास्यबोध का नितांत अभाव है, जिसकी वजह से बहुत हल्के-फुल्के ढंग से भी कुछ कहना लगभग असंभव हो जाता है। मैं यहां अलग से इन तीनों कारणों की पड़ताल करूंगा :

1. किसी राजनीतिज्ञ का कार्य : एक राजनीतिज्ञ का काम नेतृत्वकर्ता बनना और राष्ट्र के हितों के पक्ष में महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेना है। नेता संत-महात्मा बनने के लिए नहीं हैं। राजनीतिज्ञों को ऐसे निर्णय लेने की जरूरत है, जिसके अपरिमित परिणाम हो सकते हैं और इसमें कोई शक नहीं कि इस काम को करने के लिए हमें विश्वस्तरीय लोगों की आवश्यकता है। अगर हम राजनीतिक पदों को वैसे सम्मानित नहीं करते हैं, जैसेकि अन्य क्षेत्रों की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को सम्मानित किया जाना चाहिए तो हमें बेहतरीन लोग नहीं मिलेंगे क्योंकि एक तो राजनीति को अपना कॅरियर बनाने में बहुत कम आकर्षण रह जाएगा और दूसरे इससे भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा। इसे समझने की जरूरत है।

बेहतरीन, संवेदनशील और ईमानदार लोग भी अपने और अपने परिवार के लिए अच्छा और सुविधापूर्ण जीवन चाहते हैं। और जब तक वे बहुत बेहतरीन और शानदार काम कर रहे हैं, उनके निजी खर्चो के बारे में टिप्पणी करने की कोई वजह नहीं है। बेशक अगर कोई राजनीतिज्ञ सादगीपूर्ण तरीके से रहता है तो इससे उसके सम्मान में इजाफा ही होगा। लेकिन यह निजी चयन का मसला है और साफ कहें तो यह कोई वजह नहीं है कि इस कारण से उसे राजनीतिक दायित्व सौंपा जाए। हां, संभवत: उसे संत बनने का काम जरूर दिया जा सकता है।

2. वास्तविक सादगी : अतीत में हमने अपने कुछ राजनीतिज्ञों को तिकड़में और चालबाजी दिखाते हुए देखा है, मानो वे अत्यंत सादगी के रिएलिटी शो में आए हुए हों (रिएलिटी शो का यह आइडिया बुरा नहीं है)। मुझे जो बात चिंतित करती है, वह यह कि क्या उन्हें वास्तव में यह लगता है कि उच्च श्रेणी से यात्रा न करके वे सचमुच कुछ परिवर्तन ला रहे हैं। अगर हमारी लोकसभा के सभी सांसद स्थाई रूप से पांच सितारा होटलों में रहना शुरू कर दें तो भी उसका खर्चा १६क् करोड़ रुपए प्रतिवर्ष से ज्यादा नहीं होगा।

मैं किसी भी अर्थ में यह सुझाव नहीं दे रहा हूं कि उन्हें ऐसा करना चाहिए, लेकिन यह खर्च सरकार के ऊपर प्रतिवर्ष कुल खर्च होने वाली राशि दस लाख करोड़ रुपए का 0.01 प्रतिशत हिस्सा भी नहीं है। और जैसेकि वर्तमान में हमारे आरामपसंद लोग अय्याशी के तनिक भी निकट नहीं हैं, अत: उनके वर्तमान खर्चो में कटौती करने से भी कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। बेशक, यह प्रतीकात्मक जरूर होगा। लेकिन मुझे लगता है कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की इन प्रतीकात्मक भंगिमाओं से तंग आ चुकी है (इसमें प्रतिमाएं खड़ी करना भी शामिल है, जिसमें एक यूनिवर्सिटी खोलने से भी ज्यादा पैसा खर्च होता है)।

वास्तविक सादगी तीन मुख्य बातों से आ सकती है। पहला- सरकार के कर्जो को कम करना। हमारे ऊपर पड़ने वाले ब्याज का बोझ हजारों करोड़ रुपए का है और यही मुद्रास्फीति की वजह है। दूसरा-सुरक्षा पर होने वाले खर्चो में कटौती करना। रक्षा बजट में सिर्फ एक प्रतिशत कटौती से भी 1400 करोड़ रुपए की बचत होगी। तीसरा- देश भर में सरकार के ठिकाने सर्वाधिक महंगे इलाकों में हैं। आंशिक रूप से ही सही, उन्हें कम महंगे इलाकों और उपनगरों में स्थानांतरित किया जाए और मुख्य इलाकों की महंगी जमीनों को बेचकर उस धन का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में किया जाए।

वास्तव में सरकारी आवासों वाले बंगलों का किराया एक साल किसी पांच सितारा होटल में रहने के खर्च से भी कहीं ज्यादा खर्चीला है। ये सादगी के वास्तविक मानदंड हैं। ये वास्तव में कर्ज के बोझ से दबी हुई हमारी अर्थव्यवस्था में परिवर्तन लाएंगे, लेकिन इनका भावनात्मक मूल्य कम है। ऐसा करने से वैसा उत्तेजक दृश्य पैदा नहीं होगा कि एक सांसद इकोनॉमी क्लास में बैठा हुआ है और लैमोनेड पी रहा है, जैसेकि आप पीते हैं। लेकिन सच्चई यह है कि अगर हम अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार नहीं लाते हैं तो हम बहुत जल्द ही कर्ज के शिकंजे में जकड़ने वाले हैं और इसका अर्थ यह होगा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए कोई धन नहीं बचेगा।

3. हास्यबोध : मैं जानता हूं कि कुछ लोगों को यह बात बहुत तुच्छ और हल्की प्रतीत हो सकती है, लेकिन इस देश की वरिष्ठ पीढ़ी में हास्यबोध का अभाव स्थाई रूप से व्याप्त है। पूरी दुनिया में इकोनॉमी क्लास को कैटल क्लास कहा जाता है। इसका आशय लोगों से नहीं होता है, बल्कि इसका आशय उस बात से होता है जैसे एयरलाइन मछलियों की तरह लोगों को भरती है। इतनी सी बात है।

अब इसके लिए थरूर की इतनी आलोचना करने की क्या जरूरत है। भारत जैसे देश के लिए हास्यबोध बहुत आवश्यक है, जहां लोगों के बीच इतने ज्यादा विभेद हैं। आज कुछ छोटे-मोटे मुद्दों को हंसी में उड़ा देना उन्हें आगे भविष्य तक खींचकर ले जाने की तुलना मंे ज्यादा बेहतर है। गंभीर मत बनिए, जिम्मेदार बनिए। दोनों में फर्क है। तथ्य तो यह है कि शशि थरूर जैसे लोग भारतीय राजनीति में बहुत कम हैं। दूसरे किस राजनीतिज्ञ में इतना साहस है कि वह अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों के बारे में जनता को हर रोज बताए?

अगर हम बहुत मामूली और हास्यास्पद सी एक पंक्ति के लिए उनकी आलोचना करते हैं तो ऐसा करके दरअसल हम खुद को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं। अगर हम शशि थरूर को खो देते हैं और कोई नकली महात्मा गांधी बनने की कोशिश करने वाले को ले आते हैं, जो यह भी नहीं समझता आधुनिक दुनिया में प्रगति का क्या अर्थ है और वह पुरानी चीजों से प्रेरणा लेता है क्योंकि वह सस्ते ढंग से रहना चाहता है तो ऐसा करके हम भारत को पीछे धकेलेंगे। और इस समय भारत को पीछे धकेलने का खतरा हम नहीं उठा सकते हैं।

Thursday, October 1, 2009

नैतिक पतन

गिरते नैतिक मूल्यों पर सुप्रीम कोर्ट नाराज
नई दिल्ली, एजेंसीFirst Published:01-10-09 10:52 PM
Last Updated:01-10-09 11:00 PM
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उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को न्यायपालिका समेत देश में नैतिक मूल्यों में गिरावट पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है और देश के कुछ प्रमुख वकीलों के पैसे से गहरे लगाव के लिए उन्हें आड़े हाथों लिया है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा हमारा चरित्र नीचे गिरता जा रहा है। पटना में एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश से उनका बंगला पानी और बिजली की आपूर्ति बंद करने के बाद खाली कराया जा सका। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतने बड़े पदों पर आसीन लोग अनाधीकृत तरीके से कब्जा जमाए हुए हैं। ऐसे कार्यों में उच्च न्यायपालिका के लोग भी शामिल हैं।

उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति बी एन अग्रवाल एवं न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी की पीठ ने कहा कि ईश्वर की कृपा है कि उच्चतम न्यायालय में अभी ऐसा नहीं है। उच्चतम न्यायालय की पीठ ने अनाधिकृत रूप से सरकारी बंगलों पर कब्जा जमाए वीआईपी लोगों से जुड़े मामले पर उस समय नाराजगी व्यक्त की जब अदालत की सहायता के लिए नियुक्त वकील रंजीत कुमार ने सुझाया कि अगर कोई भी व्यक्ति नियत समयसीमा से भीतर परिसर नहीं खाली करते हैं तो उनका पेंशन संबंधी लाभ खत्म कर दिया जाए।

वर्ष 2005 के बाद से ही उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकार को पूर्व केंद्रीय मंत्रियों, न्यायाधीशों, सांसदों, विधायकों एवं उच्च पदस्थ नौकरशाहों जैसे वीआईपी और वीवीआईपी के अनाधिकृत कब्जा हटाने के निर्देश दिए थे। बहरहाल, सरकारी बंगलों पर अनाधिकृत कब्जे से जुड़े मामले में उच्चतम न्यायालय ने देश के लोगों में गिरते नैतिक मूल्यों पर तीखी टिप्पणी की और खेद व्यक्त किया कि जब तक हथौड़ा नहीं चलाया जाता जब तक उसके आदेशों का भी पालन नहीं किया जाता है।

पीठ ने कहा कि काम करने के लिए एक नैतिक प्राधिकार होना चाहिए। हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था जिम्मेदार है। पूरे समाज को दोषी ठहराया जाना चाहिए।