Monday, October 12, 2009

अमेरिका की मदद पर तकरार

केरी-लुगर सहायता विधेयक के सही-गलत होने को लेकर इन दिनों पाकिस्तान के सत्ता-प्रतिष्ठानों के बीच गरमा-गरम बहस चल निकली है। इस गरमा-गरमी की अपनी वाजिब वजह भी है। पाकिस्तान को सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र के लिए अमेरिका की ओर से जो सालाना 1.5 अरब डॉलर की मदद की पेशकश की गई है, उससे आर्थिक दृष्टि से तंगहाल किसी भी देश के मुंह में पानी आ सकता है, लेकिन दिक्कत इस विधेयक के साथ जुड़ी शर्तो को लेकर है। इन्हीं शर्तो की वजह से पाकिस्तान के शासन तंत्र में मतभेद उभर आए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पास इस विधेयक को हस्ताक्षर के लिए भेजने से पहले ही यह साफ हो चला था कि इससे राष्ट्रीय संवेदना को जरूर झटका लगेगा। इस विधेयक पर हस्ताक्षर होने अभी बाकी हैं, लेकिन विवाद है कि थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस विधेयक में यह प्रावधान है कि अमेरिका के विदेश मंत्री को अपने प्रशासन के समक्ष पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई और सेना की ओर से प्रमाण-पत्र पेश करना होगा। इसमें आईएसआई और सेना को यह प्रमाणित करना होगा कि वे तालिबान व अन्य आतंकी समूहों के प्रति कठोर और परमाणु अप्रसार को लेकर प्रतिबद्ध हैं।
यही नहीं, इन दोनों संस्थाओं से यह भी अपेक्षित होगा कि वे असैन्य सरकार के अधीनस्थ के तौर पर कार्य करें। इसलिए इस बात में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सेना ने विधेयक की शर्तो को लेकर सार्वजनिक रूप से चिंता जाहिर की है। सेना के कमांडरों की बैठक के बाद जारी एक बयान में कहा गया कि पाकिस्तान एक संप्रभु राष्ट्र है और इसलिए वह अपनी सुरक्षा को परिभाषित करने के लिए स्वतंत्र है। गौरतलब है कि पाक सेना द्वारा सार्वजनिक रूप से बयान जारी करने का यह दुर्लभ मौका था।
विधेयक की शर्तो पर असंतोष को लेकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को पहले से ही अंदाजा था। पार्टी ने सैन्य कमांडरों के बयान से एक रात पहले ही विधेयक का बचाव करने की कसमें खाई थीं। पार्टी ने साफतौर पर कहा था कि विधेयक की आलोचना उनके नेता जरदारी की स्थिति को कमजोर करने के मकसद से की जा रही है। लेकिन यह सार्वजनिक बयानबाजी भी सैन्य कमांडरों को बयान जारी करने से नहीं रोक पाई। अब साफ है कि इस मसले पर सेना और सत्ताधारी पार्टी आमने-सामने आ गई हैं।
सैन्य कमांडरों को बयान जारी करने के लिए उन आलोचनाओं से भी प्रेरणा मिली, जो विधेयक के आर्थिक प्रभावों को लेकर की जा रही हैं। विधेयक के पक्ष में एक दलील यह दी जा रही है कि इससे पाकिस्तान की आम जनता के जीवन स्तर को सुधारने में मदद मिलेगी, लेकिन कई लोग इससे बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं। जनरल परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में वित्तीय सलाहकार रहे डॉ. अशफाक अहमद खान का मानना है कि विधेयक से पाकिस्तान की जनता के आर्थिक विकास पर कोई सकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। इसके पक्ष में उनके अपने तर्क हैं।
अशफाक खान के मुताबिक अमेरिका ने 1.5 अरब डॉलर की जो वार्षिक सहायता देने का वादा किया है, उसमें से २क् करोड़ डॉलर उस अमेरिकी बुनियादी ढांचे पर ही खर्च किए जाएंगे जिसका मकसद सहायता कार्यक्रम पर नजर रखना है। अब इसमें से बचे 1.3 अरब डॉलर, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह पूरा पैसा पाकिस्तान सरकार को मिल पाएगा? मान लीजिए यह पूरी की पूरी रकम पाकिस्तान सरकार के माध्यम से खर्च की जाती है तो प्रति नागरिक प्रति वर्ष यह राशि बैठेगी महज आठ डॉलर। अशफाक पूछते हैं - क्या हम प्रत्येक नागरिक पर सालभर में महज आठ डॉलर खर्च करके उनके जीवन स्तर को ऊपर उठा सकते हैं?
इन विरोधाभासी विचारों के बीच सबसे बड़ा मसला यह है कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी सेना पर नियंत्रण रखने की खातिर अमेरिकी प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं। पाकिस्तान में इस विचार से इत्तेफाक रखने वालों की अच्छी-खासी तादाद है। लेकिन इस प्रक्रिया में जरदारी वाशिंगटन को पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों में दखल देने की जो राह मुहैया करवा रहे हैं, वह मुल्क के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकती है।
हाल ही में प्रकाशित कुछ रिपोर्ट्स इन आशंकाओं को बल प्रदान करती हैं, जिनमें कहा गया है कि अमेरिका अपने दूतावास के परिसर का विस्तार कर रहा है और उसने सैकड़ों मकान किराए पर उठाए हैं। संदेह है कि इनमें या तो अमेरिकी नौसैनिकों को रखा गया है या फिर ‘ब्लकवाटर’ के उन सिपाहियों को, जिन्हें अमेरिका दूसरे मुल्कों में गड़बड़ी करवाने के लिए अक्सर भाड़े पर लेता आया है। एक स्थानीय प्राइवेट फर्म इंटर-रिस्क अमेरिकी दूतावास की सुरक्षा में लगी हुई है। इसने अत्याधुनिक हथियारों का आयात किया है और साथ ही सेवानिवृत्त सैन्य कमांडरों की भी नियुक्ति की है। इसका उद्देश्य यही है कि अमेरिकी अधिकारियों और उनके कार्यालयों व आवासों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
राजधानी में शस्त्रों से लैस कुछ विदेशियों द्वारा स्थानीय पुलिस के साथ र्दुव्‍यवहार करने और फिर उनके अमेरिकी अधिकारियों द्वारा किराए पर लिए गए आवासों में छिप जाने की घटनाओं से भी पाकिस्तान सरकार की मुसीबतें बढ़ी हैं। इन सारी घटनाओं की वजह से पाकिस्तान में अमेरिका की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है। एक सर्वे बताता है कि केवल १३ फीसदी पाकिस्तानी ही बराक ओबामा की नीतियों का समर्थन करते हैं, जबकि शेष उनसे बिल्कुल निराश हैं। इसका मतलब यही है कि आर्थिक सहायता देकर पाकिस्तानियों का दिल और दिमाग जीतने की अमेरिकी नीति का मकसद केरी-लुगर विधेयक के लागू होने से पहले ही परास्त हो चुका है। विधेयक का दूसरा मकसद उन्माद और आपसी संघर्ष से ग्रस्त पाकिस्तान को स्थिरता प्रदान करना है, लेकिन वह भी दूर की कौड़ी ही नजर आता है।
पाकिस्तान की सेना द्वारा सार्वजनिक रूप से बयान जारी करना इस बात की ओर इशारा करता है कि मुल्क का राजनीतिक तंत्र लगभग ध्वस्त होने के कगार पर खड़ा है। हालांकि सत्ता पर सेना द्वारा कब्जा करने की आशंकाओं को तो अतिशयोक्तिपूर्ण ठहराकर खारिज किया जा सकता है, लेकिन यह तो साफ है कि सेना और सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बीच मतभेदों की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि उसे पाटना अब लगभग नामुमकिन नजर आता है। इससे पाकिस्तान मुस्लिम लीग के दोनों धड़ों सहित विपक्षी पार्टियों ने मध्यावधि चुनावों के लिए कमर कसनी शुरू कर दी है।
यह सारा घटनाक्रम उन वैश्विक ताकतों के लिए अच्छी खबर नहीं है जो अफगानिस्तान में तालिबान से संघर्ष पर ध्यान केंद्रित करना चाहती हैं। इस लड़ाई में पाकिस्तान एक अहम पक्ष है, लेकिन अभी तो वह अपनी ही अंदरूनी परेशानियों से दो-दो हाथ करता नजर आ रहा है।
-लेखक पाकिस्तान स्थित आज टीवी के कार्यकारी निदेशक हैं