Sunday, October 11, 2009

ऑपरेशन से पहले :नक्सलवाद

सरकार की एकमुश्त कार्रवाई के पहले धमकाने और समझौता वार्ता की कोई सूरत निकालने के लिए नक्सलियों ने अपनी छापामार लड़ाई तेज कर दी है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में 17 पुलिस वालों को मारना उनकी इसी रणनीति का हिस्सा है। इसी रणनीति के तहत वे सहानुभूति रखने वाले राजनीतिक दलों और नेताओं से भी ऑपरेशन रोकने के लिए दबाव बनवा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी और लालू प्रसाद के बयान इसी कड़ी में देखे जा सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस पुरुलिया जिले में लालगढ़ की लड़ाई को गरीब और अमीर के बीच का संघर्ष बता रही हैं। दूसरी तरफ लालू प्रसाद ने नक्सलियों के हिंसक दमन का विरोध करते हुए महंगाई के खिलाफ लड़ाई की अपील की है। नक्सलियों पर कार्रवाई को लेकर जहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी दृढ़ है, वहीं वाम मोर्चा के अन्य घटक और खुद बुद्धदेव ढुलमुल बातें कर रहे हैं। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की इसी दुविधा का लाभ उठाते हुए नक्सली एक तरफ बर्बरता कर रहे हैं तो दूसरी तरफ सामाजिक न्याय और विकास के लिए सरकार से वार्ता का प्रस्ताव भी दे रहे हैं। युद्ध और शांति की इस पैंतरेबाजी में उनकी बर्बरता ही उनके खिलाफ सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बनने जा रही है। उन्होंने झारखंड के जिस पुलिस अधिकारी का सिर कलम किया है, वह छह महीने से बिना वेतन के काम कर रहा था। इसी तरह गढ़चिरौली में मारे गए पुलिस वाले कोई बुजुरआ तो कहे नहीं जा सकते। सरकार ने इसी लिहाज से नक्सलियों से लड़ने की रणनीति भी बनाई है। सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी ने जो फैसला लिया है, उसमें एक तरफ हथियार बंद छापामार समूहों पर अतिआधुनिक हथियारों से लैस हो कर कार्रवाई शामिल है तो दूसरी तरफ समाज के वंचित तबके के लिए संपत्ति के समतावादी वितरण की योजना भी है। जाहिर है यह जटिल काम है। इसीलिए मीडिया और कुछ नेता भले नक्सल विरोधी कार्रवाई को युद्ध की संज्ञा दे रहे हों, लेकिन सरकार खुले आम ऐसा नहीं कह रही है। न ही वह वायुसेना और सेना के प्रयोग का उल्लेख करने को लेकर उत्साहित है। स्पष्ट है दीवाली और विधानसभा चुनावों के बाद का दौर जमीनी स्तर पर काफी मारधाड़ और खून-खराबे का होने जा रहा है। उम्मीद कम है फिर भी इस बीच नक्सलियों को हथियार डाल कर वार्ता करने की सद्बुद्धि आ जाए तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।