Friday, October 2, 2009

चीन का दिखावा

चीन की ओर से भारत को उकसाने या चिढ़ाने वाली कार्रवाइयों का अब एक लंबा सिलसिला हो गया है। विश्व बाजारों में मेड-इन-इंडिया की नकली छाप वाले दोयम दर्जे के सामानों की सप्लाई से लेकर इंटरनेट पर भारत के टुकड़े-टुकड़े कर देने की कथित विशेषज्ञ की खोखली सलाह तक और अरुणाचल प्रदेश में नई परियोजनाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता में अडंगे लगाने से लेकर सीमाओं के हवाई उल्लंघन व जमीनी अतिक्रमण तक इन घटनाओं में एक पैटर्न देखा जा सकता है।
कश्मीर में रहने वाले भारतीय नागरिकों को अलग ढंग का वीजा जारी करना भी इसी सिलसिले की कड़ी है। यह इस अर्थ में ज्यादा गंभीर है कि भारत के जिस अभिन्न हिस्से पर विवाद से चीन का कोई लेना-देना नहीं है, उसे विवादग्रस्त और अमान्य बताने का यह नया तरीका उसने खोजा है।
यह मानने के एकाधिक कारण हैं कि इस मोड़ पर भारत के साथ सैन्य टकराव चीन की मंशा नहीं हो सकती। एक और युद्ध से वह अपनी वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को डांवाडोल होने देने का जोखिम नहीं लेना चाहेगा। यूरोपीय बाजारों में मंदी से हुए नुकसान की भरपाई के लिए उसे भारतीय बाजार की जरूरत है। ऐसे में इन कार्रवाइयों का मकसद भारत का ध्यान भटकाना और बतंगड़ पैदा करना ही हो सकता है।
ठीक इसी वजह से भारत को इन घटनाओं से अनावश्यक रूप से विचलित दिखाई नहीं देना चाहिए। विचलित और परेशान दिखाई देकर हम आखिर उसी चीनी मकसद को पूरा कर रहे होंगे जो इन घटनाओं के पीछे हो सकता है। न ही हमें अपनी आर्थिक प्रगति और वैश्विक शक्ति बनने के लक्ष्य से ध्यान भटकने देना चाहिए। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि इन घटनाओं को अनदेखा कर दिया जाए। जहां और जितना जरूरी हो, हमें अपना विरोध दर्ज करवाते हुए इन्हें बेअसर करने के उपाय करने चाहिए, जैसा कि कश्मीरी भारतीयों को दिए गए अलग तरीके के वीजा को नामंजूर करके हमारी सरकार ने किया है।
इससे ज्यादा जरूरी और अहम यह है कि चीन के इस खुराफाती व्यवहार को समझकर उसके अनुरूप एक मुकम्मल नीति बनाई जाए। अभी तक इन घटनाओं पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया प्राय: तदर्थ और कई बार अंतर्विरोधी रही है। समान वैश्विक महत्वाकांक्षा के साथ आगे बढ़ रहे दो दिग्गज पड़ोसी देशों में भावी तीव्र प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए हमें अपनी नीति व्यवहार तय करना होगा।