पिछले करीब चालीस साल से भारत में सरकारें इस बात को आधिकारिक तौर पर स्वीकारने से बचती आई हैं कि देश में जाति प्रथा का अस्तित्व है या नहीं। वर्ष 1965 से भारत ने नस्लीय आधार पर भेदभाव के उन्मूलन के लिए गठित संयुक्त राष्ट्र संघ की समिति की बैठकों में विरोधाभासी रवैया अपना रखा है। वह एक तरफ स्वीकार करता है कि जातिवाद के नाम पर भेदभाव मानवाधिकारों के उल्लंघन के समान है।
वहीं सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र संधि में से वह जाति शब्द को हटाना भी चाहता है। इसके बजाय भारत को स्वीकारना चाहिए कि उसके यहां जातिगत भेदभाव है और इसके खात्मे के लिए उसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के साथ सहयोग करना चाहिए। इस मसले पर दोहरापन अनुचित नीति है, जिससे भारतीय सरकारों को बचना चाहिए। हमारे यहां सभी राजनीतिक दलों की चुनावी रणनीति में जाति एक अहम कारक रहा है।
भारत की कई पीढ़ियां आरक्षण नीतियों की छाया में पली हैं और आज तक किसी सरकार ने इस पर सवाल नहीं उठाया। इसलिए जातिप्रथा से फायदा उठाने वाली हमारी राजनीतिक व्यवस्था द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसे एक राष्ट्रीय चिंता बताना एक प्रकार का ढोंग नहीं तो क्या है। जातिवाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का उल्लंघन है और देश के भीतर उससे लड़ने की एक मजबूत परंपरा भी रही है। सरकार दोनों ही तथ्यों से इनकार नहीं कर सकती।
