Wednesday, October 14, 2009
विकास के पीछे का सच
हाल ही जारी संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2009 में 182 देशों की सूची में भारत को 134वां क्रम दिया गया है। मानव विकास सूचकांक के तहत जीवन की प्रत्याशा, शैक्षिक प्राप्ति, वास्तविक आय, स्वास्थ्य सेवाएं तथा सामाजिक सुरक्षा की उपलब्धियों को मापा गया है। इन मापदंडों पर भारत के लोग गुणवत्तापूर्ण जीवन और खुशहाली में पीछे हैं। भारत के मुकाबले कुछ पडोसी देशों की स्थिति बेहतर है। चीन 92वें स्थान पर है, जबकि श्रीलंका और भूटान जैसे छोटे देश क्रमश: 102 और 132वें क्रम पर हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल भारत से खराब हालत में हैं। भारत पिछले तीन साल से मानव विकास सूचकांक में लगातार फिसल रहा है। पिछले वर्ष भारत को 128वें क्रम पर रखा गया था। मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट ही नहीं कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट यह बता रही है कि भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब, सबसे ज्यादा निरक्षर, सबसे ज्यादा बीमार और सबसे ज्यादा बेरोजगार हैं।यकीनन यदि कोई व्यक्ति भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बढते हुए ग्राफ को देखे तो वह यही कहेगा कि भारत तेजी से छलांगें लगाकर आर्थिक विकास कर रहा है और देश के लोगों की जेब भारी होती जा रही है। भारत सरकार के केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के वर्ष 2008-09 के आंकडों के अनुसार देश के इतिहास में पहली बार प्रति व्यक्ति मासिक आय 3,000 रूपए के आंकडे को पार कर गई है। प्रति व्यक्ति वार्षिक आय बढकर 37,490 रूपए हो गई है। ब्रिटेन के इंस्टीट्यूट ऑफ डवलपमेंट स्टडीज (आईडीएस) के नवीनतम अध्ययन में यह बात कही गई है कि भारत में लगातार शानदार आर्थिक विकास हो रहा है, पिछले तीन वर्षो में जीडीपी बढने और आर्थिक विकास की दृष्टि से दुनिया के विकासशील देशों में चीन के बाद भारत का नम्बर है। भारत की विकास दर पिछले तीन वर्षो में नौ प्रतिशत और मंदी के वर्ष 2008-09 में भी छह प्रतिशत रही है। लेकिन ऎसी चमकीली विकास दर और ऊंची जीडीपी के बाद भी भारत में मानवीय विकास की दयनीय स्थिति के पीछे सबसे प्रमुख कारण आर्थिक विकास के लाभ देश के आम आदमी तक नहीं पहुंच पाना है। देश की जीडीपी में देश की जनसंख्या का भाग देने से प्राप्त होने वाली प्रति व्यक्ति औसत आय तो बढी हुई दिखाई दे रही है, लेकिन वास्तविक रूप में देश के 95 प्रतिशत लोगों को न्याययुक्त आय नहीं मिल रही है। तेज विकास के लाभ देश के पांच प्रतिशत लोगों की मुटि्ठयों में सीमित हो रहे हैं। आर्थिक विकास से भारत के उच्च मध्यम वर्ग के कोई पांच करोड लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और खासतौर से भारतीय कॉरपोरेट जगत के 50-55 लाख लोगों की आर्थिक स्थिति ज्यादा मजबूत हुई है।एस.डी. तेंदुलकर की अध्यक्षता में गठित भारत सरकार की समिति ने अगस्त 2009 में बताया है कि देश में 38 करोड लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं और पिछले 10 वर्षो में गरीबी रेखा के नीचे 11 करोड लोग और जुड गए है। देश में अब भी 88 करोड लोग प्रतिदिन दो डॉलर से भी कम आय में गुजारा कर रहे हैं। कम आय वर्ग के लोगों की 80 फीसदी आय उनकी भोजन, ऊर्जा जैसी जरूरतों की पूर्ति में खर्च हो जाती है और उनके पास अन्य आवश्यकताओं के लिए काफी कम रकम बचती है। खराब स्वास्थ्य और बीमारी के कारण लोग गरीबी के गहरे दुष्चक्र में फंस जाते हैं। हमें मानव विकास सूचकांक 2009 में पहले, दूसरे और तीसरे क्रम पर चमकते हुए नार्वे, ऑस्ट्रेलिया और आइसलैंड से यह सबक लेना होगा कि वहां तेज विकास दर से ज्यादा जरूरी लोगों की खुशहाली को माना गया है। हमें फ्रांस के नए आर्थिक दर्शन से सबक लेना होगा कि जीडीपी घटते जाना चिंता की बात नहीं है, लेकिन आम आदमी की खुशहाली को देश की आत्मा मानना चाहिए। हमें भी देश की खुशहाली को ऊंची जीडीपी से ज्यादा आम आदमी के चेहरे की मुस्कुराहट से मूल्यांकित करना होगा। हमें जीडीपी बढाने के प्रयास के पहले यह ध्यान देना होगा कि देश के लोग वास्तव में स्वस्थ, शिक्षित सुखी और प्रसन्न रहें। हमें ऊंची विकास दर, अरबपतियों की बढती संख्या और आर्थिक विकास की तेज रफ्तार पर खुश होने के साथ-साथ आर्थिक विषमता और समाज के आम आदमी के दुख-दर्द से सम्बन्घित भयावह तस्वीर को खुशनुमा बनाने पर ध्यान देना होगा। हमें वैश्वीकरण की चकाचौंध में गरीबों की बुनियादी जरूरतों की यथेष्ट पूर्ति पर ध्यान देकर गरीबों की कार्यक्षमता बढानी होगी। आम आदमी और गरीबों की खुशहाली से जुडी रोजगार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं से सम्बन्घित सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीरता से ध्यान केंद्रित करना होगा। हमें आर्थिक सामाजिक कल्याण की योजनाओं में हरसंभव तरीके से भ्रष्टाचार रोकना होगा और योजनाओं के संसाधनों के कुशल प्रबंधन से आम आदमी तक आर्थिक-सामाजिक कल्याण के अधिकतम लाभ पहुंचाने होंगे। देश के मानव विकास सूचकांक को नई ऊंचाई देने के लिए केंद्र सरकार अपनी तीन अति उपयोगी नई महत्वाकांक्षी योजनाओं को गति प्रदान करे। गांवों में रोजगार की सच्ची खुशियों के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को और अधिक उपयोगी बनाना होगा। देश के गरीबों को सामाजिक सुरक्षा की छतरी में लाने के लिए शुरू की गई नई पेंशन योजना को व्यावहारिक रूप देना होगा। अभावों से परेशान करोडों लोगों को रोटी की चिंताओं से बचाने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून को शीघ्रता से लागू करना होगा। ऎसा होने पर ही मानवीय विकास और जीवन स्तर के सर्वाधिक निचले पायदान पर खडे करोडों भारतीयों के चेहरे पर गुणवत्तापूर्ण जीवन की खुशहाली की मुस्कुराहट आ सकेगी और अगली मानव विकास सूचकांक रिपोर्टो में भारत का क्रम खुशहाली के साथ विकास करने वाले देशों की सूची में शामिल होने की संभावनाएं बढेंगी।जयंतीलाल भंडारी[लेखक ख्यात अर्थशास्त्री हैं]
