Sunday, October 11, 2009
ओबामा नही तो और कौन
बहस वास्तव में इस बात पर होनी चाहिए कि वर्ष 2009 के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार अगर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को नहीं मिलना था तो और किसे दिया जा सकता था। नोबेल शांति पुरस्कार के लिए योग्य व्यक्ति की खोज रसायन या भौतिकशास्त्र के लिए बंद प्रयोगशालाओं में प्राप्त की जाने वाली उपलब्धियों से हमेशा ही अलग रहेगी। प्रयोगशालाओं में खपाए जाने वाले नौ या नब्बे सालों और दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के राष्ट्रपति पद पर बिताए गए सिर्फ नौ-दस महीनों के कार्यकाल के बीच आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन न तो तर्कसंगत है और न ही न्यायसंगत। चिंता इस बात पर व्यक्त की जा सकती है कि अगर बराक ओबामा को इतना बड़ा पुरस्कार देने में हड़बड़ी दिखाई गई है तो वजह शायद यह भी रही हो कि इतनी बड़ी दुनिया में कोई दूसरा योग्य व्यक्ति नार्वे की नोबेल पुरस्कार समिति को नजर आया ही नहीं हो। अगर हालात वास्तव में ऐसे ही हैं तो वर्ष 2010 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए कोई दूसरा योग्य व्यक्ति मिल ही नहीं पाए। और बराक ओबामा पर ही फिर से नजरें टिक जाएं। महात्मा गांधी को कभी भी नोबेल शांति पुरस्कार के काबिल नहीं समझा गया। उनके नाम का तीन बार प्रस्ताव हुआ और तीनों बार उन्हें पुरस्कार के योग्य नहीं पाया गया। अपने ही देश भारत में ऐसा कई बार और कई लोगों के साथ हो चुका है और आगे नहीं होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। जयप्रकाश नारायण को सरकारों ने न तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माना और न ही कभी किसी पद्म पुरस्कार के काबिल समझा। बराक ओबामा को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर शोक के बजाए जश्न मनाना चाहिए। वह इसलिए कि ओबामा के हाथों में पुरस्कार थमाकर इस बात की व्यवस्था कर दी गई है कि आने वाले सालों में दुनिया में शांति की स्थापना करने का काम इस अश्वेत राष्ट्रपति को ही करना है। नोबेल समिति द्वारा पुरस्कार उन हस्तियों को ही दिए जाने की परम्परा रही है जो कि दुनिया को बदलने की दिशा में पहले से कोई उल्लेखनीय कार्य करके दिखा चुके हैं। बराक ओबामा का चयन इसलिए महत्वपूर्ण है कि पुरस्कार को सार्थक बनाने की जिम्मेदारी अब अमेरिकी राष्ट्रपति पर है, नार्वे की नोबेल पुरस्कार समिति पर नहीं।बराक ओबामा को पुरस्कार ऐसे वक्त दिया गया है, जिसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति भी शायद तैयार नहीं थे। दुनियाभर में अपनी खुफियागिरी का जाल बिछाने के लिए कुख्यात अमेरिकी जासूसों को भी भनक नहीं पड़ पाई कि ओस्लो में कोई ऐसा फैसला लिया जा रहा है, जो आने वाले वर्षो के लिए अमेरिकी नीतियों को प्रभावित करने वाला साबित होगा। राष्ट्रपति ओबामा भी तब नींद ले रहे थे। अमेरिका को कोई भी सदमा नींद में ही दिया जा सकता है, जागते-बूझते नहीं। ओबामा ने अगर अपनी प्रतिक्रिया में यह कहा है कि वे अपने को इतने बड़े पुरस्कार के काबिल नहीं मानते तो इसके पीछे अमेरिका जैसे राष्ट्र के प्रमुख के रूप में उनकी मजबूरियों को समझा जा सकता है। मुद्दा यह नहीं है कि बराक ओबामा को राष्ट्रपति के रूप में केवल नौ-दस महीने का ही अनुभव है और कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति अथवा परमाणु नि:शस्त्रीकरण की दिशा में अभी कोई महान योगदान नहीं दिया है, जैसा कि उनकी प्रशस्ति में गिनाया गया है। बराक ओबामा को अब यह सब करके दिखाना होगा। वे अगर अपने पहले कार्यकाल में ऐसा नहीं कर पाते हैं तो न सिर्फ दूसरे कार्यकाल के योग्य नहीं रहेंगे, उनके साथ दुनिया भर के अश्वेतों की जो आकांक्षाएं जुड़ी हैं उनका भी अंत हो जाएगा। बुश जिस तरह का व्हाइट हाउस बराक ओबामा के लिए छोड़कर गए हैं, वह केवल आतंकवाद और परमाणु अस्त्रों से भरा हुआ है। ओबामा के समक्ष चुनौती केवल यह नहीं है कि वे दुनिया में शांति कैसे कायम करेंगे, बल्कि यह भी है कि वे अमेरिका को भी कैसे आतंक के साये से आजाद कर पाते हैं। ओबामा को शांति पुरस्कार एक ऐसे वक्त दिया गया है, जब अफगानिस्तान में तैनात नाटो फौजों के अमेरिकी कमाण्डर मेकक्रिस्टल ने अमेरिकी राष्ट्रपति से मांग कर रखी है कि उन्हें और सैनिकों की जरूरत है, अन्यथा पूरा मिशन फेल हो जाएगा। नाटो गठबंधन में शामिल देश अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाना चाहते हैं। अमेरिकी सैनिक इराक से वापस स्वदेश लौटने और अपने परिवारों के साथ क्रिसमस मनाने के ख्वाब देख रहे हैं। अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजें 9/11 के बाद भेजी गई थीं। तब घोषित उद्देश्य यही था कि अमेरिका पर आतंकवादी हमले के दोषी तत्वों को खत्म कर फौजें वापस लौट आएंगी। पर ऐसा हुआ नहीं। आठ सालों के बाद भी हालात लगभग वैसे ही हैं। आतंकवाद अब पाकिस्तान में नए सिरे से पैर पसार रहा है और कीमत बराक ओबामा से वसूल करना चाहता है। अत: इस बात का केवल अंदाज ही लगाया जा सकता है कि अगर ओबामा को जरा सी भनक भी पड़ जाती तो पूरा अमेरिकी प्रशासन शायद इस प्रयास में जुट जाता कि नोबेल पुरस्कार उन्हें प्राप्त न हो। समूचे अमेरिका के साथ-साथ विश्व जानता है कि ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त होने के अर्थ क्या हैं। पर ओबामा अगर पुरस्कार को सार्थक करने में सफल हो गए तो दुनिया का नक्शा बदल भी सकता है। अश्वेत राष्ट्रपति ऐसा करके दिखा भी सकते हैं। नोबेल पुरस्कार समिति को अपने फैसले पर पश्चाताप करने का मौका न भी मिले।
