Monday, October 5, 2009

बोफोर्स केस

मामले पर सुनवाई के दौरान सालिसिटर जनरल ने उच्चतम न्यायालय को सूचित किया है कि सरकार ने इटली के व्यापारी ओट्टावियो क्वात्रोच्चि के खिलाफ दायर सभी मामले वापस लेने का फैसला किया है। क्वात्रोच्चि बोफोर्स मामले में एकमात्र जीवित अभियुक्त है। न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ को यह सूचना देने के बाद तीन अक्टूबर को मामले की सुनवाई के दौरान तीस हजारी अदालत में अर्जी देकर कहा गया कि क्वात्रोच्चि के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला, इसलिए इस मामले को वापस लेने का फैसला किया गया है। इस तरह साढे तेईस साल तक बोफोर्स घोटाले या महाघोटाले के नाम से विख्यात रहे इस मामले को बेढंगे तरीके से दफनाया जा रहा है। बोफोर्स मुद्दे के कारण 1989 के आम चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को जबर्दस्त शिकस्त झेलनी पडी थी, जो पांच साल पहले अपूर्व बहुमत के साथ सत्ता में आए थे। स्वीडन की कम्पनी बोफोर्स से भारत सरकार के दस अरब रूपए से ज्यादा के सौदे के एक साल बाद अप्रेल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने एक समाचार प्रसारित किया था। इसमें कहा गया था कि बोफोर्स कम्पनी ने तोप बेचने के इस सौदे के लिए करोडों रूपए की घूस दी थी। बोफोर्स कम्पनी का भारत में प्रतिनिधि विन चbा, लंदन निवासी तीन हिंदुजा भाई, तत्कालीन रक्षा सचिव एस.के. भटनागर और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का नाम भी इस घोटाले में उछला। इटली की रासायनिक खाद कम्पनी स्नेमप्रोगेती के भारत में प्रतिनिधि क्वात्रोच्चि का नाम इस घोटाले में लिया गया तो भारत में उद्योग और वाणिज्य क्षेत्र के जानकारों को कतई आश्चर्य नहीं हुआ। सक्रिय दलाल और विभिन्न सरकारी विभागों व मंत्रालयों में आसानी से पैठ के कारण लोग उसे जानते थे। लोकसभा में कांग्रेस को मिले प्रचण्ड बहुमत के कारण इस मामले में टालमटोल की जाती रही। अगस्त 1987 में बोफोर्स सौदे की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति बनाई गई, जिसमें कांग्रेसियों का बहुमत था। धीरे-धीरे इत्मीनान से जांच कर एक साल में संसदीय समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची कि इस सौदे में कोई गडबडी नहीं हुई और सौदे की प्रक्रिया ईमानदारी के साथ पूरी की गई। जनवरी 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में नई सरकार बनने पर अर्थात सौदा होने के पौने पांच साल बाद बोफोर्स सौदे को लेकर भ्रष्टाचार, बेईमानी और आपराधिक साजिश का मामला दर्ज किया गया।इतने लम्बे समय तक मामला दर्ज नहीं होने के कारण शुरू में जांच-पडताल में बहुत दिक्कत हुई। दलाली का पैसा किसी ज्यादा सुरक्षित जगह पर ले जाने का मौका संबद्ध लोगों को मिल गया। बैंक खाते विभिन्न देशों में डमी कम्पनियों के नाम से थे। स्विट्जरलैंड के कानून और बैंकों की खातेदारों के बारे में गोपनीयता रखने की नीति से जांच कार्य में गंभीर बाधा पैदा हुई, जिससे दलाली के पैसे का पीछा पूरी तरह नहीं हो पाया। हिंदुजा बंधुओं ने स्विट्जरलैंड की विभिन्न अदालतों में कई याचिकाएं दायर कर अडंगे डाले। सरकारों में जल्दी-जल्दी बदलाव और कांग्रेस के समर्थन पर टिकी साझा सरकारों के कारण जांच के काम में ब्ा्रेक लगते रहे। समय बीतने के साथ सजा दिलाने के लिए जरू री सबूत मिलने की संभावनाएं क्षीण होती गईं। इसी दौरान 21 मई 1991 को राजीव गांधी की एक चुनावी सभा में आत्मघाती बम विस्फोट कर हत्या कर दी गई। विन चbा और एस.के. भटनागर की मृत्यु 2001 में हो गई। नरसिंहराव के प्रधानमंत्री काल (1991-96) में जांच के काम में कोई खास प्रगति नहीं हुई। आखिर सीबीआई ने बोफोर्स सौदे को तेरह साल से ज्यादा बीतने के बाद अक्टूबर 1999 में अदालत में आरोप पत्र दायर किया। इसमें विन चbा, एस.के. भटनागर, मार्टिन आर्डब्ा्रो, क्वात्रोच्चि और बोफोर्स कम्पनी को अभियुक्त बनाया गया। आरोप पत्र में राजीव गांधी का उल्लेख ऎसे अभियुक्त के रू प में था, जिसे 'सुनवाई के लिए मामले में शामिल नहीं' किया गया था। यह ओछी, तिरस्कारपूर्ण और तुच्छ चेष्टा साबित हुई क्योंकि इस मामले में राजीव गांधी के शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिला था। इसलिए वर्ष 2004 के शुरू में दिल्ली उच्च न्यायालय ने बेहिचक राजीव गांधी को क्लीनचिट दे दी थी। अनुमान और निष्कर्ष कितने ही तर्कसंगत हों, उन्हें सबूत नहीं माना जा सकता। सीबीआई की ओर से अदालत में दायर दूसरे आरोप-पत्र में तीन हिंदुजा बंधुओं को भी अभियुक्त बनाया गया था। उन्हें भी दिल्ली उच्च न्यायालय ने बाइज्जत बरी कर दिया था।क्वात्रोच्चि ही बोफोर्स मामले में एकमात्र अभियुक्त रह गया था। उसे सुनवाई के लिए भारत लाने की मलेशिया और अर्जेंटीना में की गई दो कोशिशें सिरे नहीं चढ पाईं। अर्जेंटीना में तो भारत की किसी अदालत के गिरफ्तारी वारंट भी पेश नहीं किए गए, जो महत्वपूर्ण थे। क्वात्रोच्चि के लंदन में स्थित बैंक खातों से लेन-देन पर लगी रोक जिस तरह हटाई गई और बाद में जिस तरह उसके खिलाफ जारी रेड कार्नर नोटिस वापस लिया गया, वह बोफोर्स के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। घूस के साधारण मामलों में भी यदि अभियुक्त रंगे हाथों नहीं पकडा जाए तो उसे दोषी साबित करना टेढी खीर होता है। इसके लिए रिश्वत देने वाले का पूरा सहयोग मिलना जरू री होता है। ऊंचे स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार के मामलों में तो सबूत मिल पाना और मुश्किल हो जाता है क्योंकि उसमें ली गई मोटी रकम विदेशों में स्थित ऎसे बैंकों में जमा करा दी जाती है जो गोपनीयता के लिए मशहूर हैं। बोफोर्स मामले से आम लोगों की इस धारणा को भी बल मिला है कि पैसे और पहुंच वालों की बात ही कुछ और होती है, वे आम आदमी की तरह कानून की गिरफ्त में नहीं आ सकते। सीबीआई ने बोफोर्स मामले में घूस की रकम 64 करोड रूपए बताई थी। आजकल के चर्चित घोटालों के हिसाब से देखें तो यह रकम नगण्य-सी है। दूसरी ओर इसकी बरसों चली लम्बी जांच पर लगभग ढाई अरब रूपए खर्च हो गए और सजा एक भी अभियुक्त को नहीं मिल पाई।अरूण भगत[लेखक गुप्तचर ब्यूरो के निदेशक रहे हैं