भारत के हर राज्य के लोगों को दुनिया के लगभग हर देश में पाया जा सकता है। सबसे ज्यादा नजर आते हैं - सिंधी, सिख, गुजराती और केरल के लोग। इन चारों राज्यों के विदेशों में रह रहे लोग कम से कम एक पीढ़ी तक अपनी मातृभूमि के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश करते हैं और अगर वे अच्छा-खासा कमा रहे हैं तो अपनी बचत का एक हिस्सा अपने भाई-बहनों के जीवन स्तर को उन्नत करने के लिए घर भेजते हैं। कुछ उदाहरण दिमाग में आते हैं : हिंदुजा (सिंधी) ने मुंबई में विशालकाय अस्पताल का निर्माण करवाया है।
सर गुलाम नून (गुजराती) ने राजस्थान में, जहां उन्होंने कुछ वर्ष गुजारे थे, तमाम आधुनिक सुविधाओं से सज्जित अस्पताल बनवाया है। वर्तमान में पंजाब में मुश्किल से ही कोई ऐसा गांव होगा, जहां ऐसा गुरुद्वारा, अस्पताल, स्कूल या कॉलेज न हो, जो विदेश में रहने वाले गांव के किसी व्यक्ति ने बनवाया हो। अभी हाल ही में प्रकाशित किताब सिख डायसपोरा फिलैन्थ्रॉफी इन पंजाब : फिलैन्थ्रॉफी गिविंग फॉर लोकल गुड, जिसका संपादन वेनी एस डच्यूसेनबेरी और दर्शन एस टाटला ने किया है, में अपना देश छोड़कर पूरी दुनिया में और विशेष रूप से इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका में बसे हुए सिख समुदाय के पूरे इतिहास का सर्वेक्षण है।
यह किताब उनके योगदान के बारे में बताती है और यह कि वह कौन सी बात है, जिसने उन्हें अपनी आय का एक हिस्सा इन कामों में लगाने के लिए प्रेरित किया। उन शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि विदेश में रहने वाले सभी समुदाय के लोग भारत में कट्टरपंथी हिंदू संगठनों को पैसे देते हैं। लगभग एक दशक तक सिख अलगाववादी संगठनों और खालिस्तानी आतंकवादियों को विदेश में बसे हुए उनके सिख अनुगामियों से अच्छा-खास पैसा मिलता रहा। सौभाग्य से उन्हें समय रहते अपनी गलती का एहसास हो गया, पैसे आने बंद हो गए और खालिस्तान की मांग भी बंद हो गई। आज उनमें से सिर्फ एकाध नाम ही बचे रह गए हैं जो समय-समय पर मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए भड़काऊ बयान देते रहते हैं। कोई भी उनकी बात पर रत्ती भर ध्यान नहीं देता है।अपनी आय का दसवां हिस्सा दान करने की परंपरा उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना सिख धर्म है। गुरुनानक ने अपने अनुयायियों को उपदेश दिया था:अक्ली साहिबु सेवीए, अक्ली पाई मानु।अक्ली पढ़ के बूझत, अक्ली कीजे दान।।अर्थात भगवान की सेवा करने के लिए अपनी अकल का इस्तेमाल करो और आदर पाओ। पढ़ने-समझने और दान करने के लिए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करो।घाल खाल की टुट्टन देनानक राह पचन्ने से।अर्थात अपनी कोशिशों और मेहनत से कमाए हुए धन का एक हिस्सा दान करो। नानक कहते हैं कि ऐसे व्यक्तियों को ही सच्च मार्ग मिलता है।एक के बाद एक सभी गुरुओं ने अपनी आय का एक हिस्सा जरूरतमंदों को देने की प्रशंसा की है, जब तक कि यह एक आदर्श लक्ष्य न बन जाए:किरत करो, नाम जपो, वंड छको।काम करो, भगवान का नाम लो और अपनी कमाई दूसरों के साथ बांटो।इस भेजे हुए धन को जिस तरह से खर्च किया जाता है, उसका एक नियत तरीका बन गया है। नए गुरुद्वारे बनवाना सबसे पहली वरीयता होती है। स्कूल और अस्पताल दूसरे और तीसरे नंबर पर आते हैं।............................................जूता फेंकने वाले की कहानी : जरनैल सिंह याद हैं? यह वही व्यक्ति है, जिसने गृह मंत्री पीसी चिदंबरम पर जूता फेंका था। उसने गलत शिकार चुना क्योंकि चिदंबरम ने उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था और न ही चिदंबरम का उस बात से कोई लेना-देना था, जो बात जरनैल सिंह को गुस्सा दिला रही थी। जो भी हो, उसने उसे निशाना बनाया, जो उसके दिमाग में था। ये तो कांग्रेस पार्टी के नेतागण थे, जिन्होंने आगामी लोकसभा चुनावों में दो सीटों पर जगदीश टाइटलर और सज्जन सिंह को टिकट दिया था।अपने जीवन में की गई उनकी अक्षम्य हरकतों के कारण कांग्रेस आलाकमान को अंतत: उनके नाम वापस लेने पड़े। जरनैल सिंह फिर से खबरों में आने वाले हैं। पेंगुइन (इंडिया) ने जरनैल सिंह के साथ अपनी कहानी सुनाने और यह बताने के लिए कि उन्होंने जो किया, वह क्यों किया, एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं। उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं है। इसलिए उन्होंने यह हिंदी में लिखा है। उसका अंग्रेजी अनुवाद ‘आई एक्यूज’ शीघ्र ही प्रकाशित होगा। ‘आई एक्यूज’ सिख दंगों से जुड़े उन सभी लोगों के खिलाफ गंभीर आरोप है, जो उस समय अपना दायित्व निभाने में असफल रहे, जब 31 अक्टूबर 1984 को अपने दो सिख अंगरक्षकों द्वारा इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दंगाइयों की भीड़ ने 5000 से ज्यादा मासूम सिखों को मार डाला, उनके घर और संपत्ति तहस-नहस कर दी और उन्हें लूटा। अपनी ताकत का इस्तेमाल करने की कायरतापूर्ण अक्षमता और राष्ट्रपति भवन की सुरक्षागाह से बाहर निकलने की उनकी अनिच्छा के लिए राष्ट्रपति जैल सिंह का नाम विशेष रूप से आता है। दिल्ली प्रशासन और खासतौर से दिल्ली पुलिस दंगाई भीड़ के साथ थी। राजीव गांधी यह कहकर कि ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है’ अप्रत्यक्ष रूप से इस अपराध के भागीदार थे और एचकेएल भगत और जगदीश टाइटलर जैसे लोग हिंसा को भड़काने के लिए जिम्मेदार थे। जरनैल सिंह का परिवार इस हत्याकांड का शिकार हुआ था। वे लोग पाकिस्तान से आए शरणार्थी थे, जिन्हें लाजपत नगर में एक जगह शरण मिल गई थी। उनके पिता बढ़ई थे, जो अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए पर्याप्त धन कमा लेते थे। जरनैल सिंह हिंदू लड़कों के साथ क्रिकेट खेला करते थे। अचानक 31 अक्टूबर को एक तूफान उठा और उनके पड़ोसी उनके खिलाफ हो गए। युवक ऊंचाई पर छिप गए, लेकिन बहुत से मित्रों और रिश्तेदारों को मार डाला गया और बहुतों को जिंदा जला दिया गया। यह दहला देने वाली कहानी है, जो एक ऐसे आदमी ने लिखी है, जिसने अपनी आंखों के सामने यह सब होते देखा। यह विश्वसनीय है क्योंकि यह एक चोट खाए दिल से निकली है।
