अभी हाल ही में शशि थरूर के ‘कैटल क्लास’ वाले साधारण बयान और सुविधाजनक जीवन जीने के लिए अपना पैसा अपने ऊपर खर्च करने पर जिस तरह अतिरंजित किस्म की प्रतिक्रियाएं हुई हैं, मैं उससे गंभीर रूप से परेशान हूं। इस दौरान सादगी का दिखावा, मितव्ययता बरतने के लिए जननेताओं के बयान, शताब्दी एक्सप्रेस की यात्रा, बिजनेस क्लास की सुविधाओं को बंद करना और नैतिकता का ऊंचा धरातल इत्यादि देखने को मिला, जिसे इस देश की पुरानी पीढ़ी थोड़ा-सा भी प्रेरित किए जाने पर अपनाना चाहती है। इसमें तीन मुख्य बातें मुझे चौंकाती हैं।
पहली, हममें से बहुत से लोग अभी भी इस बात को लेकर दुविधा में हैं कि वास्तव में एक राजनीतिज्ञ से क्या अपेक्षा करनी चाहिए। दूसरी, वास्तविक सादगी के पैमाने पर कोई बहस ही नहीं होती, जिससे वास्तव में सरकार की कर्ज के बोझ से दबी हुई अर्थव्यवस्था में कोई बदलाव आएगा। और तीसरी, भारतीयों में हास्यबोध का नितांत अभाव है, जिसकी वजह से बहुत हल्के-फुल्के ढंग से भी कुछ कहना लगभग असंभव हो जाता है। मैं यहां अलग से इन तीनों कारणों की पड़ताल करूंगा :
1. किसी राजनीतिज्ञ का कार्य : एक राजनीतिज्ञ का काम नेतृत्वकर्ता बनना और राष्ट्र के हितों के पक्ष में महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेना है। नेता संत-महात्मा बनने के लिए नहीं हैं। राजनीतिज्ञों को ऐसे निर्णय लेने की जरूरत है, जिसके अपरिमित परिणाम हो सकते हैं और इसमें कोई शक नहीं कि इस काम को करने के लिए हमें विश्वस्तरीय लोगों की आवश्यकता है। अगर हम राजनीतिक पदों को वैसे सम्मानित नहीं करते हैं, जैसेकि अन्य क्षेत्रों की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को सम्मानित किया जाना चाहिए तो हमें बेहतरीन लोग नहीं मिलेंगे क्योंकि एक तो राजनीति को अपना कॅरियर बनाने में बहुत कम आकर्षण रह जाएगा और दूसरे इससे भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा। इसे समझने की जरूरत है।
बेहतरीन, संवेदनशील और ईमानदार लोग भी अपने और अपने परिवार के लिए अच्छा और सुविधापूर्ण जीवन चाहते हैं। और जब तक वे बहुत बेहतरीन और शानदार काम कर रहे हैं, उनके निजी खर्चो के बारे में टिप्पणी करने की कोई वजह नहीं है। बेशक अगर कोई राजनीतिज्ञ सादगीपूर्ण तरीके से रहता है तो इससे उसके सम्मान में इजाफा ही होगा। लेकिन यह निजी चयन का मसला है और साफ कहें तो यह कोई वजह नहीं है कि इस कारण से उसे राजनीतिक दायित्व सौंपा जाए। हां, संभवत: उसे संत बनने का काम जरूर दिया जा सकता है।
2. वास्तविक सादगी : अतीत में हमने अपने कुछ राजनीतिज्ञों को तिकड़में और चालबाजी दिखाते हुए देखा है, मानो वे अत्यंत सादगी के रिएलिटी शो में आए हुए हों (रिएलिटी शो का यह आइडिया बुरा नहीं है)। मुझे जो बात चिंतित करती है, वह यह कि क्या उन्हें वास्तव में यह लगता है कि उच्च श्रेणी से यात्रा न करके वे सचमुच कुछ परिवर्तन ला रहे हैं। अगर हमारी लोकसभा के सभी सांसद स्थाई रूप से पांच सितारा होटलों में रहना शुरू कर दें तो भी उसका खर्चा १६क् करोड़ रुपए प्रतिवर्ष से ज्यादा नहीं होगा।
मैं किसी भी अर्थ में यह सुझाव नहीं दे रहा हूं कि उन्हें ऐसा करना चाहिए, लेकिन यह खर्च सरकार के ऊपर प्रतिवर्ष कुल खर्च होने वाली राशि दस लाख करोड़ रुपए का 0.01 प्रतिशत हिस्सा भी नहीं है। और जैसेकि वर्तमान में हमारे आरामपसंद लोग अय्याशी के तनिक भी निकट नहीं हैं, अत: उनके वर्तमान खर्चो में कटौती करने से भी कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। बेशक, यह प्रतीकात्मक जरूर होगा। लेकिन मुझे लगता है कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की इन प्रतीकात्मक भंगिमाओं से तंग आ चुकी है (इसमें प्रतिमाएं खड़ी करना भी शामिल है, जिसमें एक यूनिवर्सिटी खोलने से भी ज्यादा पैसा खर्च होता है)।
वास्तविक सादगी तीन मुख्य बातों से आ सकती है। पहला- सरकार के कर्जो को कम करना। हमारे ऊपर पड़ने वाले ब्याज का बोझ हजारों करोड़ रुपए का है और यही मुद्रास्फीति की वजह है। दूसरा-सुरक्षा पर होने वाले खर्चो में कटौती करना। रक्षा बजट में सिर्फ एक प्रतिशत कटौती से भी 1400 करोड़ रुपए की बचत होगी। तीसरा- देश भर में सरकार के ठिकाने सर्वाधिक महंगे इलाकों में हैं। आंशिक रूप से ही सही, उन्हें कम महंगे इलाकों और उपनगरों में स्थानांतरित किया जाए और मुख्य इलाकों की महंगी जमीनों को बेचकर उस धन का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में किया जाए।
वास्तव में सरकारी आवासों वाले बंगलों का किराया एक साल किसी पांच सितारा होटल में रहने के खर्च से भी कहीं ज्यादा खर्चीला है। ये सादगी के वास्तविक मानदंड हैं। ये वास्तव में कर्ज के बोझ से दबी हुई हमारी अर्थव्यवस्था में परिवर्तन लाएंगे, लेकिन इनका भावनात्मक मूल्य कम है। ऐसा करने से वैसा उत्तेजक दृश्य पैदा नहीं होगा कि एक सांसद इकोनॉमी क्लास में बैठा हुआ है और लैमोनेड पी रहा है, जैसेकि आप पीते हैं। लेकिन सच्चई यह है कि अगर हम अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार नहीं लाते हैं तो हम बहुत जल्द ही कर्ज के शिकंजे में जकड़ने वाले हैं और इसका अर्थ यह होगा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए कोई धन नहीं बचेगा।
3. हास्यबोध : मैं जानता हूं कि कुछ लोगों को यह बात बहुत तुच्छ और हल्की प्रतीत हो सकती है, लेकिन इस देश की वरिष्ठ पीढ़ी में हास्यबोध का अभाव स्थाई रूप से व्याप्त है। पूरी दुनिया में इकोनॉमी क्लास को कैटल क्लास कहा जाता है। इसका आशय लोगों से नहीं होता है, बल्कि इसका आशय उस बात से होता है जैसे एयरलाइन मछलियों की तरह लोगों को भरती है। इतनी सी बात है।
अब इसके लिए थरूर की इतनी आलोचना करने की क्या जरूरत है। भारत जैसे देश के लिए हास्यबोध बहुत आवश्यक है, जहां लोगों के बीच इतने ज्यादा विभेद हैं। आज कुछ छोटे-मोटे मुद्दों को हंसी में उड़ा देना उन्हें आगे भविष्य तक खींचकर ले जाने की तुलना मंे ज्यादा बेहतर है। गंभीर मत बनिए, जिम्मेदार बनिए। दोनों में फर्क है। तथ्य तो यह है कि शशि थरूर जैसे लोग भारतीय राजनीति में बहुत कम हैं। दूसरे किस राजनीतिज्ञ में इतना साहस है कि वह अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों के बारे में जनता को हर रोज बताए?
अगर हम बहुत मामूली और हास्यास्पद सी एक पंक्ति के लिए उनकी आलोचना करते हैं तो ऐसा करके दरअसल हम खुद को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं। अगर हम शशि थरूर को खो देते हैं और कोई नकली महात्मा गांधी बनने की कोशिश करने वाले को ले आते हैं, जो यह भी नहीं समझता आधुनिक दुनिया में प्रगति का क्या अर्थ है और वह पुरानी चीजों से प्रेरणा लेता है क्योंकि वह सस्ते ढंग से रहना चाहता है तो ऐसा करके हम भारत को पीछे धकेलेंगे। और इस समय भारत को पीछे धकेलने का खतरा हम नहीं उठा सकते हैं।
