Sunday, October 11, 2009

veetuark: ओबामा नही तो और कौन

बराक ओबामा को नोबेल पुरस्कार देने से एक गंभीर खतरा यह पैदा हो गया है कि वे इसे गंभीरता से ले सकते हैं। शुरुआती संकेत यही है कि वे ऐसा ही करेंगे। पुरस्कार की घोषणा के बाद उन्होंने कहा, ‘मैं इसे इस रूप में स्वीकार करता हूं कि मुझे अब काम करना होगा।’ इसका मतलब यही है कि उन्होंने कम से कम यह स्वीकार कर लिया है कि अब तक उन्होंने कुछ नहीं किया। सवाल यह है कि आखिर नोबेल समिति ने पिछले छह महीने में ऐसा क्या देख लिया? क्या महमूद अब्बास, नेतान्याहू और ओबामा ने फलस्तीन राष्ट्र का निर्माण कर दिया? क्या हिजबुल्लाह तेहरान में वार्ता करने को चला गया? क्या भारत और पाकिस्तान ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए किसी समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए और ओबामा पृष्ठभूमि में मंडराते रहे?ओबामा ने अफगानिस्तान की लड़ाई में और 50 हजार सैनिक झोंक दिए, ताकि पेंटागन के सैन्य अफसर अगले एक दशक तक चट्टानी मैदानों में युद्ध लड़ते रहें। अफगानिस्तान में अमेरिकी उपस्थिति को न्यायसंगत ठहराने को लेकर भले ही ओबामा के अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन ओस्लो में बैठे भलेमानुसों को कम से कम इस लड़ाई की समाप्ति का तो इंतजार कर लेना चाहिए था। नोबेल समिति का आधिकारिक तर्क है कि ओबामा उम्मीद के प्रतीक हैं। यह तो अच्छी बात है। इससे भविष्य में पुरस्कार जीतने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। अब बस उम्मीद करनी है, और शायद प्रार्थना भी, कि लश्कर-ए-तैयबा गांधीवाद की राह पर चलने लगे। इससे हो सकता है कि अक्टूबर २क्१क् में आपके लेटरबॉक्स में भी ओस्लो से एक शानदार खत आ जाए।क्या परमाणु अप्रसार पुरस्कार जीतने की वजह है? यदि ऐसा ही है तो फिर ओबामा से भी ज्यादा काम तो कर्नल एम गद्दाफी ने किया है। उन्होंने अपने देश में परमाणु हथियार संयत्र को ही खत्म कर दिया। उन्होंने भले ही यह दबाव में किया, लेकिन कुछ किया तो सही। ओबामा ने क्या किया? बस कुछ शानदार भाषण दे दिए। ओबामा ने परमाणु हथियारों से लैस दुनिया के सबसे सम्पन्न उस देश को वश में करने के लिए कुछ नहीं किया, जो स्वयं को अंतरराष्ट्रीय नियंत्रणों व संधियों से सदैव ऊपर ही समझता आया है। यह देश उनका अमेरिका ही है। ओबामा का जोर परमाणु अप्रसार पर ही रहेगा। हालांकि वे अमेरिका की परमाणु ताकत को लेकर कुछ नहीं करेंगे। वे ‘बिग फाइव’ को लेकर भी कुछ नहीं कर सकते। उनके पास यही विकल्प होगा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नेस्तनाबूद किया जाए और भारत को जितना संभव हो सके, धमकाया जाए। यदि बुश इराक के लिए खतरनाक थे तो ओबामा भारत के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।यह हो सकता है कि नोबेल समिति के सामने ऐसे लोगों का अभाव हो, जिन्हें कि पुरस्कार दिया जा सके, लेकिन इस पुरस्कार का दायरा सुधारवादी योद्धाओं से भी परे मानवीयता तक बढ़ाया जा चुका है। हमारे पास योग्य व्यक्तियों या संस्थानों की कमी नहीं हैं। ऐसे कई डॉक्टर हैं, जिन्होंने युद्धरत इलाकों में निस्वार्थ भाव से काम किया है। वोहुमुद alऐसे डॉक्टर पैसा और इनाम दोनों पाने के हकदार हैं। आगा खान भी ऐसे ही नाम हैं, जिन्हें भले ही पैसों की दरकार न हो, लेकिन उनके फाउंडेशन ने मानव सभ्यता के कई महान स्मारकों के संरक्षण का जो कार्य किया है, उससे वे सम्मान पाने के हकदार तो बनते ही हैं।ओबामा को नोबेल पुरस्कार देने का एक बहुत बड़ा कारण मौजूद है। हालांकि वह उनके प्रशस्ति पत्र में नहीं लिखा गया है। ओबामा ने अमेरिका के हालिया इतिहास के सबसे बड़े युद्ध उन्मादियों रिपब्लिकनों को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया है। विश्व शांति में इसे एक योगदान माना जा सकता है।