देश के विभिन्न राज्यों में नक्सलियों का आतंक बढता जा रहा है। बिहार और झारखंड समेत कुछ राज्यों में आहूत दो दिन के बंद के जरिए नक्सली अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहे हैं। पटरियां उखाड रहे हैं और हमले कर रहे हैं। नक्सलियों ने पिछले दिनों तो हद कर दी। झारखंड के सीआईडी (विशेष शाखा) के इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदूवार की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के नक्सलियों द्वारा बर्बरतापूर्वक सिर काटकर हत्या और उसके बाद गढचिरोली (महाराष्ट्र) जिले में 18 पुलिसकर्मियों की हत्या व एक व्यक्ति का सिर कलम करने की घटनाओं से देश भर में सदमे जैसा माहौल बन गया।
इन वारदातों से माओवादियों ने देश की जनता और सरकार को चेताया है कि वे अपनी क्रांति के लिए एक कदम और आगे बढाने को तत्पर हैं। विगत में भी नक्सली देश में ऎसे बर्बर नरसंहार कर चुके हैं। इसी साल मार्च में, एक तथाकथित जन अदालत (जो वास्तव में माओवादी कंगारू गुट है और खुद को कानून की अदालत कहता है) ने पुलिस का मुखबिर बताकर एक व्यक्ति का सिर कलम कर दिया था। जून 2008 में मुरगांव (गढचिरोली) में एक आत्म-समर्पित माओवादी का सिर भी धड से अलग कर दिया गया था। नक्सलियों ने झारखंड में अप्रेल 2007 में भी दो भाइयों की सिर काट कर हत्या कर दी थी, उन पर नक्सलियों को पुलिस का मुखबिर होने का शक था। इस तरह का अपराध करने वाले अपने कृत्य का औचित्य कुछ भी बताएं, इक्कीसवीं सदी में इस सभ्य समाज में ऎसे अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं है। खेद की बात है कि मनुष्य इतना पतित भी हो सकता है। लेकिन इसकी महज निंदा ही पर्याप्त नहीं है। ऎसे अमानवीय कृत्य करने वालों पर मुकदमे चलने चाहिए और उन्हें सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। खेदजनक है कि सोच समझकर ठण्डे दिमाग से ऎसी हत्याएं करने वाले फरार रहते हैं।
केन्द्रीय गृहमंत्री के अनुसार बीस प्रदेशों के 223 जिलों के लगभग दो हजार थाना क्षेत्रों में नक्सली सक्रिय हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि वर्ष 2008 में नक्सली हिंसा की 1591 वारदातें हुईं, जिनमें 721 लोग मारे गए थे। इस साल अगस्त के अन्त तक देश भर में नक्सली हिंसा में 580 लोग जान गंवा चुके हैं। नक्सलियों के निशाने पर विशेष रू प से पुलिसकर्मी रहते हैं झारखंड में पिछले साढे छह साल में इंस्पेक्टर इंदूवार 339वें पुलिसकर्मी हैं, जो नक्सली हिंसा का शिकार हुए हैं। दुख की बात यह है कि सरकार की घोर लापरवाही के कारण आज नक्सलियों का जाल देश भर में फैल गया है। चार साल पहले प्रधानमंत्री ने चेताया था कि नक्सली देश की सुरक्षा के लिए सबसे बडी चुनौती हैं। इसके बावजूद तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल इस संबंध में नीति तैयार करने और जरू री दिशा निर्देश देने में विफल रहे थे। अब जाकर कुछ नहीं करने और समस्या के स्वत: ही कम हो जाने की उम्मीद रखने की नीति में बदलाव आया है। अब नक्सलियों से निपटने की रणनीति बनाई जा रही है, कमियों को दूर करने और हथियारों व साजो-सामान की व्यवस्था की जा रही है। समन्वय व गुप्तचर व्यवस्था को बेहतर बनाया जा रहा है। इस तरह के कदम उठाने की जरू रत बरसों पहले ही थी और ऎसा नहीं करने की हमें बहुत बडंी कीमत चुकानी पडी है।
माओवादियों ने इस दौरान हमारी अकर्मण्यता का पूरा फायदा उठाया और अपना प्रभाव क्षेत्र बढा लिया व अपने गढों में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली। अत्याधुनिक हथियार जुटा लिए और गुप्तचरी व संचार ढांचा मजबूत कर लिया। उनके बढे हौसलों की परिचायक हैं जल्दी-जल्दी हो रही हिंसक वारदातें और जून 2009 में माओवादियों के पोलित ब्यूरो का 'युद्ध तेज करने का फैसला'। माओवादियों ने जवाबी हमले तेज करने और अपने संघर्ष को नए इलाकों में फैलाने का भी फैसला किया है ताकि 'दुश्मन' की ताकत बंट जाए और वह उनके ठिकानों पर हमले से बाज आए। केन्द्र और विभिन्न प्रदेशों की सरकारें ने दीपावली के बाद नक्सलियों के विरूद्ध बडा अभियान छेडने का फैसला किया है, संभवत: इसी को ध्यान में रखकर माओवादियों ने उक्त फैसला किया है। इस अभियान को 'ग्रीन हंट' नाम दिया गया है। सुरक्षा पर गठित मंत्रिमंडलीय समिति की 8 अक्टूबर को हुई बैठक में समझा जाता है कि नक्सलियों के खिलाफ बडा अभियान छेडने को मंजूरी दे दी गई है। समय रहते कार्रवाई में विफल रहने की देश ने खर्चे और लोगों की जान दोनों दृष्टि से बहुत महंगी कीमत चुकाई है। वर्ष 1971 में प. बंगाल के चार, बिहार के तीन और उडीसा का एक जिला नक्सली आंदोलन की चपेट में था।
तब स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ ने 45 दिन तक अभियान चलाकर इस आंदोलन को खत्म किया था। नक्सलियों को घेरे से बाहर नहीं निकलने देने के लिए सेना ने बाहरी घेराबंदी की थी। स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ ने तलाशी अभियान चलाया था। अब 223 जिलों में नक्सलियों से निपटना है। अब तो नक्सलियों के पास अत्याधुनिक हथियार भी हैं। वे अपनी ताकत साबित कर चुके हैं। नक्सल-प्रभावित राज्यों में अगले तीन साल में विकास कार्यो पर सात खरब 30 अरब रूपए की विशाल धनराशि खर्च की जाएगी। प्रभावित इलाकों को नक्सलियों से मुक्त कर वहां सिविल प्रशासन कायम किया जाएगा और विकास कार्य प्राथमिकता से कराए जाएंगे। शुरू में छत्तीसगढ, झारखंड, उडीसा और महाराष्ट्र के 6 जिलों में यह अभियान चलेगा। इसमें सेना की मदद नहीं ली जाएगी, लेकिन जरू रत पडने पर राहत, बचाव और कार्रवाई के लिए उसे तैयार रखा जाएगा।
नक्सली भागकर दूसरे राज्यों में नहीं जा छिपें, इसके समुचित प्रबंध किए जाएंगे। इस अभियान की सफलता विभिन्न प्रदेशों की पुलिस के बीच बेहतर समन्वय पर निर्भर करेगी। आम लोगों को इस अभियान में मदद के लिए आगे आना चाहिए। साथ ही पुलिस को मानवाधिकारों के उल्लंघन से बचते हुए अनुशासन के उच्च मानदंडों को अपनाना होगा। इस युद्ध में विद्रोहियों की पराजय के साथ ही दिल जीतना महत्वपूर्ण होगा।
अरूण भगत
[लेखक गुप्तचर ब्यूरो के निदेशक रहे हैं]
