क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक वंशवाद उभरना, जाति आधारित पार्टियों का बडे पैमाने पर पनपना और व्यक्तिवाद को बढावा गठबंधन सरकारों के इस युग के अनोखे पहलू हैं।
आंध्र प्रदेश में वाईएसआर के बेटे जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए छिडा अभियान गहराई तक जड जमा चुके सामन्तवादी रवैए की याद दिलाता है। क्या हमारा समाज सामन्तवादी है, जो लोकतंत्र को अपना रहा है जिस तरह भारत में लोकतंत्र चल रहा है, उससे देश विभिन्न छोटी-बडी जागीरों में बंट गया लगता है। कश्मीर में डॉ. फारूख अब्दुल्ला से लगाकर दक्षिण में करूणानिधि तक क्षेत्रीय नेता, जातीय क्षत्रप और समाजवादी इस महान भारतीय लोकतंत्र में राजवंशों की तरह उदित हो रहे हैं। पटनायक, देवेगौडा, पवार, सिंधिया, ठाकरे से लेकर यह सूची दिनोंदिन लम्बी होती जा रही है। कुछ गिनी-चुनी राजनीतिक पार्टियां ही अभी तक वंशवाद की इस बुराई से बची हुई हैं। इनमें जनता दल (यू) और कम्युनिस्ट पार्टियां शामिल हैं। बहुजन समाज पार्टी भी वंशवादी राजनीति से तो अभी तक मुक्त है, लेकिन जातिवादी राजनीति में वह गहरी धंसी हुई है। मायावती जिस तरह खुद को प्रस्तुत कर रही हैं, उसमें लोकतांत्रिक भावना तो कहीं नजर नहीं आती।
अब राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बेटे राजेन्द्र शेखावत को अमरावती (महाराष्ट्र) से कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में टिकट दिया है। प्रदेश के वित्त राज्यमंत्री सुनील देशमुख का टिकट काटकर उन्हें उम्मीदवार बनाया गया है। कर्नाटक में पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में अपने बेटे को टिकट न मिलने पर माग्रेट अल्वा ने विरोध जताया था तो उनसे पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा ले लिया गया था। अल्वा का आरोप था कि कर्नाटक में कुछ टिकट पैसा लेकर बांटे गए।
वंशानुगत राजनीति को बढावा देने के आरोप जवाहर लाल नेहरू , श्रीमती इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी पर भी समय-समय पर लगते रहे हैं। राहुल गांधी की उभरते युवा नेता की छवि को ध्यान में रखकर उसकी काट के लिए नेहरू -गांधी परिवार से ही जुडे मेनका गांधी के बेटे वरूण गांधी को भाजपा आगे बढा रही है।
जवाहर लाल नेहरू , सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्र देव जैसे अनेक नेता बरसों तक संघर्ष और सेवा कर बडे नेता बने थे, लेकिन आज नेताओं के बेटे-बेटी, भतीजे अपने रिश्तों के कारण राजनीति में आगे आ रहे हैं और बरसों से परिश्रम और संघर्ष कर रहे जुझारू कार्यकर्ताओं का हक मार रहे हैं। सार्वजनिक जीवन में आई गिरावट का एक कारण यह भी है।
पिछले आठ सालों में इस वंशवादी राजनीति के कारण पार्टियों में स्वाभाविक नेतृत्व उभरने की प्रक्रिया का दम घुट रहा है। जाति आधारित राजनीतिक पार्टियों ने हालात को और बिगडने में अहम भूमिका निभाई है। हरियाणा में चौ. देवीलाल के बेटे ओमप्रकाश चौटाला ने प्रदेश को अपनी व्यक्तिगत जमींदारी की तरह चलाया। पंजाब में प्रकाशसिंह बादल और उनका बेटा अकाली दल में हावी हैं। जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला और फारूख अब्दुल्ला के बाद अब उमर अब्दुल्ला के हाथ में नेशनल कांफ्रेंस की बागडोर है। उमर अपनी सरकार को जागीरदार की तरह चला रहे हैं जम्मू-कश्मीर में प्रमुख विपक्षी पार्टी पीडीपी मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा की जेबी पार्टी की तरह चलती है। इनमें से किसी की भी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का मतलब है मुलायम सिंह, उनके बेटे और भाइयों की पार्टी। लालू प्रसाद यादव ने तो बिहार में अपनी जगह अपनी पत्नी राबडी देवी को ही मुख्यमंत्री बनाकर साफ संकेत दे दिया था कि पार्टी में और किसी की कोई कदर नहीं है।
धुर दक्षिण में द्रविड आंदोलन एक-दो परिवारों का शगल बनकर रह गया है। द्रमुक तो करूणानिधि की बपौती बनी हुई है और अन्नाद्रमुक में जयललिता का एकछत्र राज्य है। आंध्र प्रदेश में तेदेपा की स्थापना एन.टी. रामराव ने की थी। अब उनके दामाद चन्द्रबाबू नायडु पार्टी को पारिवारिक जागीर की तरह चला रहे हैं। उडीसा में बीजू जनतादल और कुछ नहीं नवीन पटनायक के रू प में पटनायक परिवार का ही विस्तार है।
भाजपा के नीचे लुढकने और उसकी नीतियों की कटु आलोचना के बावजूद यह कहा जा सकता है कि उसमें अन्य पार्टियों की तरह वंशवाद नहीं पनपा है। लेकिन उसके अनेक नेताओं के बेटे-बेटी पार्टी का टिकट लेने में सफल रहे हैं। इनमें नवीनतम नाम प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन का लिया जा सकता है। यह परम्परा अच्छी नहीं है। इस पर लगाम लगनी ही चाहिए, लेकिन इस पर लगाम लग पाएगी, इसमें संदेह ही है। भाकपा और माकपा जैसी वामपंथी पार्टियां अब भी अपने कैडर को ही आगे बढाती हैं, वहां अभी तक वंशवाद नहीं है।
भारत तेजी से वंशवादी राजनीति का जीता-जागता प्रमाण बनता जा रहा है। लेकिन राजनीतिक वंशवाद पनपता तभी है जब मतदाता वोट देकर उन्हें जिताते हैं और पार्टी के कार्यकर्ता ही उन्हें शिखर तक पहुंचाते हैं। ऎसे मतदाताओं की कमी नहीं है जो पार्टी और नेता के परिवार में अन्तर नहीं कर पाते।
हरिहर स्वरू प
[लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं]
