पिछले दिनों केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा कि शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार को समाप्त करने के ल
िए सरकार गंभीरता से प्रयास कर रही है। इस संबंध में पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी महेश प्रसाद का कहना है कि देश में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए पर्याप्त कानून हैं पर उन्हें गंभीरता से अमल में नहीं लाया जाता। पेश है करप्शन दूर करने के उपायों पर श्री प्रसाद से नरेश तनेजा की बातचीत-
सरकार द्वारा भ्रष्टाचार मिटाने के तमाम प्रयास असफल क्यों साबित हुए?
इसलिए कि समय से मुकदमा दर्ज करने व उसे आगे बढ़ाने की कार्रवाई नहीं हो पाती। इसी दौरान आरोपित भ्रष्ट लोग मैनेज कर लेते हैं। भ्रष्टाचार सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं है। इसमें प्राय: उनसे भी उच्च स्तर के लोग शामिल पाए गए हैं। ऐसे लोग आमतौर पर सत्ता में प्रभावी होते हैं और सत्ता में बैठे लोगों को इधर से उधर करने की क्षमता भी रखते हैं।
क्या संविधान का अनुच्छेद- 311 सख्त कानून बनाने की राह में बाधा है?
नहीं, यह कोई बाधा नहीं है बल्कि इसकी व्याख्या करते समय इसे एक बाधा बनाकर पेश कर दिया जाता है। इस अनुच्छेद में सरकारी अधिकारियों की नौकरी को संरक्षण दिया गया है। यह प्रावधान अच्छे उद्देश्य से किया गया था ताकि सरकारी अधिकारी बेवजह राजनीतिक हस्तक्षेप की चपेट में न आ पाएं। बेशक, यह अनुच्छेद उनके करियर की सुरक्षा से संबंधित है, तो भी राज्यपाल व राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वे किसी अधिकारी के भ्रष्टाचार व देशद्रोह के आरोपों में लिप्त पाए जाने पर सरकार की सिफारिश पर उसे नौकरी से अलग कर सकते हैं।
भ्रष्टाचार को लेकर कोई सक्षम कानून क्यों नहीं बन पा रहा है?
भ्रष्टाचार को लेकर प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के नाम से कानून तो बना है। इसके तहत सीबीआई को जांच करने का अधिकार भी है। मगर उसमें सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार की परमीशन की जरूरत पड़ती है। परमीशन इसलिए ताकि निर्दोष अधिकारी प्रताड़ित न हों और उनके खिलाफ दूषित मंशा से मुकदमा दायर न किया जा सके। कई बार अधिकारी जरूरत के मुताबिक सख्त निर्णय लेते हैं, जिससे नाराज होकर कई सार्मथ्यवान व्यक्ति बदले की भावना से उनके खिलाफ झूठे दोषारोपण करने की कोशिश करते हैं। पर कार्रवाई से पूर्व सरकारी परमीशन लेने के प्रावधान का आज दुरुपयोग हो रहा है। या तो परमीशन नहीं मिलती या मामला कई साल लटका रहता है। यहीं राजनीति हो जाती है, भ्रष्ट लोग राजनेताओं को प्राय: खुश कर लेते हैं और उनका संरक्षण प्राप्त कर लेते हैं। कई बार आरोपितों के सहकर्मी ही उनको प्रश्रय देने लगते हैं। सो, भ्रष्टाचार को रोकने का कानून तो है पर उसका पालन नहीं हो रहा।
कहीं ऐसा तो नहीं कि आज समाज ने भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया है?
समाज में भ्रष्टाचार इतने व्यापक तौर पर फैल गया है कि लोगों ने यहां तक कहना शुरू कर दिया है कि बस, जैसे भी हो हमारा काम हो जाए, चाहे कोई पैसा लेकर ही कर दे। आज समाज में भ्रष्टाचार का इतना प्रतिरोध नहीं रहा। हालांकि भ्रष्टाचार हमारी विकास दर के डेढ़ प्रतिशत को ही प्रभावित करता है। यानी हम अगर अभी साढ़े छह प्रतिशत विकास दर के साथ चल रहे हैं तो भ्रष्टाचार न होने पर यह दर आठ प्रतिशत या उससे अधिक हो सकती थी। पर, सभी भ्रष्ट हों या भ्रष्टाचार का समर्थन करते हों, ऐसा नहीं है। ईमानदार लोग व अधिकारी हर वर्ग में पाए जाते हैं।
भ्रष्टाचार विरोधी कानून के तहत अफसरों को लाने की बात तो होती है पर नेताओं को इसमें लाने पर काम क्यों नहीं होता?
लोकपाल या लोकायुक्त संस्था के तहत प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति को छोड़कर सभी लोगों को लाए जाने की बात हो रही है। कुछ राज्यों में ऐसा हो चुका है पर, इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़कर राजनेताओं पर लगे आरोप अक्सर साबित ही नहीं हो पाते।
जजों द्वारा अपनी संपत्ति सार्वजनिक करने से क्या न्यायपालिका से भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा?
लोगों की उठती उंगलियां देखकर थोड़ा डर तो कायम हो ही जाएगा। पर, संपत्ति का जो विवरण घोषित करने वाले व्यक्ति द्वारा दिया जा रहा है, उसे ही आरटीआई के तहत लाया जा सकता है। उसके संबंधियों के नाम पर जो संपत्ति है, वह न तो स्वैच्छिक घोषणा के तहत आएगी न ही आरटीआई के तहत क्योंकि किसी भी प्राइवेट व्यक्ति के बारे में आरटीआई के तहत नहीं पूछा जा सकता। और यह बात सिर्फ न्यायपालिका तक ही सीमित नहीं है, राजनेताओं और अफसरों पर भी लागू होती है।
क्या प्रशासनिक सुधार आयोग का कोई असर पड़ा?
छिटपुट बातों को छोड़कर बहुत ज्यादा असर देखने में नहीं आया। हालांकि इस सुधार आयोग की सिफारिशों की जांच की जा रही है।
