Tuesday, September 29, 2009

सुप्रीम कोर्ट की व्यथा

रुका हुआ फैसला
अभी तक मुकदमों का फैसला करने में न्यायपालिका की तरफ से होने वाली देरी चर्चा में रहती थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा पाए लोगों की दया याचिकाओं पर राष्ट्रपति की तरफ से निर्णय लेने में देरी का मुद्दा उठा कर कार्यपालिका को उसके दायित्वों की याद दिलाई है। अदालत ने तन्हाई में फांसी का इंतजार कर रहे कैदियों के मानवाधिकार के नजरिए से यह रुख अपनाया है, लेकिन उसकी व्यापक चिंता न्याय के प्रति है। सही है कि मौत और जिंदगी के बीच में झूल रहे व्यक्ति को दो-तीन साल से ज्यादा समय तक अनिश्चितता में रखना उसके और उसके परिवार को यातना देने जैसा है। ऐसे में वह संविधान के अनुच्छेद-21 में प्रदत्त जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार के तहत अपनी सजा कम कराने का दावा कर सकता है। लेकिन अदालत की चिंता उससे भी ज्यादा न्याय और दंड के असर को लेकर है। अगर अति बिरले मामलों में मिलने वाली फांसी की सजा पाए व्यक्ति को भी समय पर फांसी नहीं दी जाती तो इस सजा का वह असर जाता रहेगा, जिसके लिए यह बनाई गई और बरकरार रखी गई है। फांसी यूरोप सहित दुनिया के तमाम विकसित देशों में समाप्त कर दी गई है। बल्कि यूरोप किसी अपराधी के प्रत्यर्पण पर संबंधित देश से यह वचन ले लेता है कि उसे फांसी नहीं दी जाएगी। लेकिन अमेरिका सहित भारत, चीन, ईरान और पाकिस्तान जहां भी यह सजा बरकरार है, उसका एक उद्देश्य समाज में जघन्य अपराधों के लिए प्रतिरोध पैदा करना है।

न्याय के इस प्रभाव में अगर राजनीतिक कार्यपालिका अड़चन बन रही है तो सुप्रीम कोर्ट की चिंता वाजिब है। दया याचिकाओं पर फैसला राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है लेकिन उसमें राज्य सरकारें और केंद्रीय गृह मंत्रलय के सुझाव अहम भूमिका निभाते हैं। इन दया याचिकाओं में कुछ तो राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील अपराधियों से संबंधित होती हैं। जैसे संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु या राजीव गांधी की हत्या करने वाले संथानम और मुरुगन वगैरह। शायद सरकार इन पर फैसला करने से पहले देश-विदेश की राजनीतिक स्थितियों पर पड़ने वाले असर का आकलन करती है। अदालत ने विधिक न्याय और राजनीतिक न्याय के इसी अंतर्विरोध की तरफ संकेत करते हुए सरकार को इस दुविधा से निकलने की सलाह दी है। सही समय पर न्याय को गले लगाने की यह तत्परता व्यवस्था में हमारे विश्वास को दृढ़ करने में सहायक सिद्ध होगी।