Wednesday, September 30, 2009

इन डा नेम ऑफ़ गोड एंड सुप्रीम कोर्ट

राजनीतिक नेतृत्व ने जनभावनाओं के भड़कने के भय से इस मामले से दूर रहना ही उचित समझा। यही वजह है कि स्वार्थी तत्वों ने जहां चाहा, वहां पूजा घर बनवाकर सार्वजनिक जमीन हथियाई। उन्होंने सड़कों, बस स्टैंड, दफ्तरों और पार्कों तक पर कब्जा जमाया। दिल्ली से सटे एनसीआर के कई इलाकों में तो हरित पट्टियों पर भी ऐसे लोगों ने मनचाहे निर्माण किए। जब कभी प्रशासन ने आपत्ति की तो इन्होंने आम aadmi ki bhavano ko bhadkakar ekjoot kar liya shanti vayavastha banaye रखने के लिए सरकार को सब कुछ बर्दाश्त करना पड़ा। आश्चर्य तो यह है कि विभिन्न धार्मिक संगठनों ने भी इस खेल को रोकने के लिए कुछ नहीं किया।
इससे धर्म के नाम पर अपनी दुकानदारी चलाने वालों का मनोबल बढ़ता गया। लेकिन समय के साथ लोगों की मानसिकता बदल रही है। शिक्षा और सूचना क्रांति के प्रसार ने समाज पर गहरा असर डाला है। धामिर्क आस्था और पूजा-पाठ में कोई कमी तो नहीं आई है, लेकिन इसे लेकर विवेक भी विकसित हुआ है। लोग सामाजिक जीवन और धार्मिक आचार-विचार में सामंजस्य पर जोर देने लगे हैं। वे आधुनिक जीवन में नागरिक सुविधाओं के महत्व को समझ रहे हैं। जो समझदार हैं, वे नहीं चाहते कि धार्मिक आस्था की रक्षा के नाम पर शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास प्रभावित हो। इसलिए हाल के दिनों में जब प्रशासन ने कुछ पूजा स्थलों को स्थानांतरित करने की पेशकश की तो लोगों ने उसे स्वीकार कर लिया।

कोर्ट के आदेश से प्रशासन को अब और ताकत मिलेगी। लेकिन धार्मिक समुदायों की भी यह जवाबदेही है कि वे इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएं। धर्म का मकसद व्यक्ति और समाज को अनुशासित बनाना है। यदि किसी धर्म के नाम पर समाज में अनुशासनहीनता और अराजकता को बढ़ावा मिल रहा है, तो इसका अर्थ है कि उस धर्म के आंतरिक अनुशासन में कमी आ रही है। धर्म गुरु इस पहलू पर भी ध्यान दें।
ese dharm sathlo me se 50 persent ka pryg rajanate haitu hota hai .or adalat ke ese aadesho kee avmanna bhee sarkare kartee rahee hai lekein jo purane bun chuke hai unhe sohaard poorvak tudvaana chahiye .