Monday, September 28, 2009

हमारे पडोशी देश

इतिहास गवाह है कि भारत पड़ोसी देशों से कई बार ग़च्चा खा चुका है। वह पड़ोसियों की हरकतों से लगातार परेशान है। इन दिनों सीमा पर चीन की गतिविधियां ज्यादा चर्चा में हैं। सवाल उठता है कि क्या चीनी घुसपैठ या छोटी-मोटी झड़पें युद्ध का रूप ले सकती हैं? भारत को परेशान करने की चीनी रणनीति का तोड़ आख़िर क्या है..?

चीन को लेकर भारत में अजीब-सी स्थिति पैदा हो गई है। ऐसा लगता है कि जनता जाग रही है और सरकार सो रही है। सीमा पर चीन क्या-क्या हरकतें कर रहा है, यह जानने के जितने साधन जनता के पास हैं, उनसे कहीं ज्यादा सरकार के पास हैं। जनता को जगाने वाले सिर्फ़ अख़बार और टीवी चैनल हैं।

अख़बार और टीवी कहते हैं कि चीनी सैनिक हमारी सीमाओं में घुसकर हमारे नागरिकों को तंग करते हैं, चट्टानों पर चीन का नाम लिख देते हैं, उन्होंने भारत-तिब्बत सैन्य-दल के दो जवानों को मार दिया है और वे हमारी सीमाओं में बंकर भी खड़े कर रहे हैं। भारत सरकार का प्रवक्ता कहता है कि ये सब ख़बरें निराधार हैं। सरकार को अख़बार और टीवी की ख़बरें तो उपलब्ध हैं ही, उसके पास अनेक गुप्तचर संस्थाएं हैं, स्थानीय प्रशासन है और नागरिक हैं, जो उसे बराबर ख़बरें देते रहते हैं। ऐसे में किस पर भरोसा किया जाए?

साधारणत: सरकार पर भरोसा करने का ही मन बनता है, लेकिन हमारी सरकारें पड़ोसी देशों से इतनी बार गच्चा खा चुकी हैं कि आम जनता में बेचैनी फैल रही है। यदि सरकार सतर्क होती, तो मुंबई-हमला ही क्यों होता? आतंकवादियों को समुद्र-तट पर ही दबोच लिया जाता। आख़िर करगिल-युद्ध कैसे शुरू हुआ? कई महीनों से चली आ रही घुसपैठ की पाकिस्तानी तैयारियों का हमारी सरकार को कुछ पता ही नहीं चला। 1948 में यदि कश्मीर के चरवाहों ने शोर नहीं मचाया होता, तो श्रीनगर पर भी पाकिस्तान का कब्जा हो जाता।

1962 का युद्ध अचानक नहीं हो गया था। उसकी तैयारी चीन 12 साल से कर रहा था। 1957 में खुर्नाक के किले पर जब हमारे जवानों के शव चीन ने हमें सम्हलाए, तो भी हमारी नींद नहीं खुली। हिंदी-चीनी भाई-भाई की खुमारी में हम अपना कर्तव्य भूल गए। वही दुखद पटकथा अब दुबारा तो नहीं लिखी जा रही है?

शायद नहीं! इसीलिए भारत सरकार बार-बार कह रही है कि सीमा पर कोई झड़पें नहीं हुई हैं, भारत-तिब्बत दल के कोई जवान नहीं मारे गए हैं, चट्टानों पर चीनी भाषा जरूर लिखी है लेकिन ‘चीन’ नहीं लिखा हुआ है और दोनों तरफ के स्थानीय कमांडरों के बीच संपर्क बना हुआ है। भारत सरकार ऐसा क्यों कह रही है? वह उत्तेजित क्यों नहीं है? इसके कारण स्पष्ट हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि दोनों दशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा अभी तक खींची नहीं गई है, जैसी कि भारत और पाकिस्तान के बीच है।

जंगलों, पहाड़ों, नदियों और झीलों के आर-पार मोटी-मोटी पहचानों के आधार पर सीमाएं मान ली जाती हैं। मानी हुई सीमाओं के दोनों तरफ प्राय: बस्तियां नहीं होतीं, लोग नहीं रहते, सैनिक शिविर नहीं होते। ऐसे में गश्त लगाते हुए एक देश की सैनिक टुकड़ियां दूसरे देश की सीमा में चली जाती हैं। यह अनजाने में भी हो जाता है और कभी जान-बूझकर भी। चीनी अख़बार अक्सर आरोप लगाते रहते हैं कि भारतीय टुकड़ियां चीनी-सीमा में घुस आती हैं।

इस तरह की घटनाएं भारत-पाक सीमांत पर तो अक्सर होती रहती हैं और वहां तो ऐसा दोनों पक्षों की तात्कालिक सहमति से भी हो जाता है, क्योंकि दोनों पक्ष एक-दूसरे की भाषा समझते हैं। भारत और चीन के बीच ऐसी घटनाएं स्थानीय नहीं रह पातीं। वे तूल पकड़ लेती हैं। भारत सरकार इन घटनाओं को अनावश्यक तूल नहीं देना चाहती, लेकिन यदि वह बिल्कुल ही मौन रहेगी, तो यह ग़लत होगा। यह उदासीन रवैया चीन को ज्यादती करने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

भारत सरकार को यह पता है कि हमारे पूरे अरुणाचल प्रदेश को चीन अपना हिस्सा मानता है और लद्दाख में भी उसने लंबे-चौड़े दावे ठोक रखे हैं। यदि भारत सरकार उसकी इन छोटी-मोटी घुसपैठों पर लीपा-पोती करती रहेगी, तो वह प्रकारांतर से चीनी दावों को मजबूत करेगी। चीन से जरा-सा औपचारिक विरोध जताने में भी हमें डर क्यों लगता है? क्या चीन युद्ध छेड़ देगा?

चीन को पता है कि यह 1962 नहीं है। भारत की कुल सैन्य-शक्ति काफी बढ़ी है और भारतीय सीमांत पर उसकी सतर्कता अपूर्व है। इसके अलावा आज का चीन अब से 45-50 साल पहले के चीन से बिल्कुल अलग है। वह दादागीरी छोड़कर बनियागीरी में लग गया है। वह दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारी राष्ट्र बनने की फ़िराक में है। भारत-जैसे पड़ोसी से युद्ध मोल लेकर वह सारी दुनिया में बदनाम होना पसंद नहीं करेगा। भारत के साथ ही उसका व्यापार इस वर्ष 60 अरब डॉलर को छूने वाला है। वह भारत के विदेश व्यापार का सबसे बड़ा भागीदार बन गया है।

विश्व-व्यापार के क्षेत्र में दुनिया के मालदार देशों की तिकड़मों के विरुद्ध उसने भारत के साथ साझा-मोर्चा भी बना रखा है। उसे पता है कि भारत के साथ युद्ध करके उसे भयंकर आर्थिक नुक़सान भुगतना पड़ सकता है। वह यह भी जानता है कि अरुणाचल और लद्दाख की निर्जन और बंजर जमीन के कुछ हिस्से झपट लेने से उसे कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होने वाला है। वह पहले ही भारत से बहुत बड़ा है और कुछ लाख भारतीयों को जोड़ लेने से सवा अरब के समुद्र में कौन-सा छौंक लगने वाला है?

इसके अलावा लोकतंत्र और हिंदी के शौक़ीन ये भारतीय चीन के पाचन-तंत्र को चौपट कर देंगे। इसलिए चीन हमारे सीमांत पर छोटी-मोटी चिउंटियां काटता रहता है, ताकि उसका संवैधानिक दावा बना रहे। इसी कारण चीन दलाई लामा के अरुणाचल जाने का विरोध करता है। उसका कहना है कि वह चीन का प्रदेश है, उसमें चीन का दुश्मन दलाई लामा कैसे जा सकता है? चीन तो भारतीय प्रधानमंत्री को भी अरुणाचल न जाने की सलाह दे रहा था। यह चीन की हिमाक़त है। अफ़सोस है कि चीन की इस हिमाक़त का जवाब भारत सरकार बहुत ही नरम शब्दों में देती है। क्यों देती है? वह क्या करे?

वह तिब्बत को चीन का प्रदेश मान चुकी है। वरना वह भी चीन के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के तिब्बत जाने का विरोध कर सकती थी। भारत सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत को चीन की जितनी जरूरत है, उतनी ही चीन को भारत की जरूरत है। यदि भारत चीन के हर पैंतरे का तुर्की-ब-तुर्की जवाब दे, तो चीन क्या कर लेगा? यदि भारत ऐसा नहीं करेगा, तो धीरे-धीरे चीन दक्षिण एशिया के सभी देशों में भारत की नींव खोखली कर देगा। क्यों न कर देगा?

कौटिल्य के अनुसार तो किसी भी शक्तिशाली राष्ट्र का यह राजधर्म है। चीन अपने राजधर्म का निर्वाह निष्ठापूर्वक कर रहा है। उसने भारत के चारों तरफ घेरा डालने की कोशिश की है। पाकिस्तान को भारत के खिलाफ़ खड़ा करने की जितनी लगातार कोशिश चीन ने की है, अमेरिका ने भी नहीं की। चीन की पाकिस्तान-नीति का शीत-युद्ध से कोई लेना-देना नहीं रहा। उसका तो सिर्फ़ एक ही सूत्र रहा- भारत-विरोध! चीन ने पाकिस्तान को परमाणु तकनीक और मिसाइलें दीं, हर युद्ध में भारत के विरुद्ध समर्थन दिया और अब उसने बलूचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह भी बना दिया है।

नेपाल के माओवादियों की पीठ ठोकने में चीन कोई कसर नहीं छोड़ रहा, क्योंकि वे भारत-विरोधी हैं। म्यांमार में चीन ने इतने पांव पसार लिए हैं कि रंगून की सैनिक सरकार भारत को गैस देने के लिए तैयार नहीं है। बांग्लादेश अपनी सीमा में से पाइपलाइन नहीं आने देना चाहता। श्रीलंका की सरकार को भारत से विमुख करने के लिए चीन ने वहां बंदरगाह बनाने, हथियार देने और तकनीकी सहायता के लिए अपनी थैली के मुंह खोल दिए हैं।

भारत ने अफ़गानिस्तान को यदि 1.2 अरब डॉलर की सहायता दी है, तो चीन ने 3.5 अरब डॉलर देकर तांबे की खदान ख़रीद ली है। रूस के सखालिन द्वीपों में निकल रहा अकूत तेल कहीं भारत के हाथ न लग जाए, चीन इस चिंता में दुबला हुआ जा रहा है। चीन भारत को सुरक्षा-परिषद का स्थायी सदस्य भी नहीं बनने देना चाहता, उसने अरुणाचल को मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय सहायता में भी अड़ंगा डालने की कोशिश की है और वह परमाणु आपूर्ति क्लब में भी भारत के विरुद्ध मोर्चा लगाए हुए है। ऐसा लगता है कि चीन पूरे एशिया का दादा बनने को आमादा है।

चीन की इस एकध्रुवीयता की एकमात्र चुनौती भारत ही है, क्योंकि भारत लोकतंत्र है, आर्थिक और सामरिक दृष्टि से समर्थ है और आजकल वह अमेरिका से भी घनिष्टता बनाए हुए है। इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखें, तो सीमांत की छुट-पुट घटनाओं के अर्थ कुछ अलग ही नजर आएंगे। लेकिन इस नजरिए के आधार पर क्या हमारा विदेश मंत्रालय कोई वैकल्पिक रणनीति बना रहा है? वैकल्पिक रणनीति का अर्थ चीन के प्रति आक्रामक होना नहीं है। लेकिन हमारी कूटनीतिक उदासीनता लंबे दौर में भारत के लिए बहुत मंहगी पड़ सकती है।

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